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Thursday, February 28, 2013

लाभकारी शास्त्रीय वाजीकर योग-

पुष्पधंवा रस- इस योग का सेवन स्त्री और पुरुष दोनों ही के लिए लाभकारी रहता है और यह बहुत ही प्रसिद्ध योग है। इसकी 1-1 गोली सुबह और शाम पीसकर इसमें 1.5 चम्मच मक्खन और मिश्री मिलाकर प्रयोग करने से स्त्री और पुरुष दोनों ही की संभोग करने की शक्ति और रुचि में वृद्धि होती है। इसके ऊपर से दूध में पिंड खजूर को उबालकर खाएं और दूध को पी लें। इसका सेवन करने से लगभग 10 दिनों के अंदर ही शरीर में काम-उत्तेजना जागृत होने लगती है। किसी स्त्री या पुरुष को किसी दुर्घटना या दिमागी चोट के कारण संभोग करने की इच्छा न करती हो तो इसका सेवन करने से उनकी संभोग करने में रुचि जागृत होने लगती है। इसके सेवन से लिंग की नसों में रक्त का संचार होने लगता है जिससे लिंग ज्यादा उत्तेजित होता है और संभोग शक्ति में चरम सुख प्राप्त होता है। जिन दंपतियों के घर में कोई संतान पैदा नहीं होती वह भी इसका सेवन करने से संतान प्राप्ति कर सकते हैं।

वानरी गुटिका- लगभग 150 ग्राम कौंच के बीजों को 2 लीटर दूध में डालकर उबाल लें। उबलने पर जब दूध गाढ़ा हो जाए तो इसे नीचे उतारकर ठंडा कर लें और बीजों के छिलके उतार लें। इसके बाद इन बीजों को बिल्कुल बारीक पीसकर रख लें। अब बीजों की पिट्ठी बनाकर इतनी ही मात्रा में मैदा मिलाकर एकसाथ गूंथ लें। फिर इसमें थोडा सा गिल्ट और मिल्कमेड का गुलाब जामुन पाउडर मिलाकर छोटे-छोटे आकार के गोले बनाकर गाय के घी में हल्का गुलाबी होने तक तलें।
इन्हे एकतार की चाशनी में डालते जाएं। ठंडा होने के बाद इस चाशनी में ही शहद डालकर किसी कांच के बर्तन में सुरक्षित रख लें। इस 1-1 गुलाब जामुन को सुबह और शाम सेवन करने से पुरुष के शरीर में संभोग करने की शक्ति बहुत तेज हो जाती है।

जब व्यक्ति शराब के नशे में हो प्राथमिक उपचार-

अगर कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा नशे में हों तो सबसे पहले उसे उल्टी कराएं, ताकि उसका पेट खाली हो जाए। उल्टी कराने के लिए नशे में ग्रस्त व्यक्ति को नमक का दो या तीन गिलास गुनगुना घोल पिलाएं (घोल बनाने के लिए एक गिलास पानी में चाय की एक चम्मच भर नमक मिलाएं)। फिर उसे एप्सम साल्ट का गाढ़ा घोल पिलाएं। यह घोल आधा गिलास पानी में दो चाय की चम्मच एप्सम साल्ट क्रिस्टल घोलकर बनाया जाता है।

नशे में डूबे व्यक्ति के शरीर को गरम रखें। उसे कंबल आदि उड़ाएं लेकिन गरम पानी की थैली का उस पर प्रयोग न करें। वैसे एल्कोहल शरीर की ऊपरी सतह पर गरमी का एहसास पैदा कर देता है, पर उसके नशे में
ग्रस्त व्यक्ति को बहुत जल्दी ठंड लग जाती है और उसे जल्दी ही निमोनिया हो सकता है। किसी भी हालत में शराब के नशे में धुत व्यक्ति को कोई भी शामक (सेडेटिव) न दें।

योग क्या है?

योग की परिभाषा में आत्मा और परमात्मा के मिलन को योग बोलते हैं अर्थात हमारे अंदर दिव्यशक्तियां उत्पन्न करने वाली क्रिया ही योग है। योगग्रंथ में योग के 8 अंगों को बताया गया है। आत्मा को ईश्वर से संबंध स्थापित करने के लिए मन की चंचलता को रोककर, उसे नियंत्रित कर, उसे एकाग्रता प्रदान करते हुए समाधि को प्राप्त कर लेना ही योग कहलाता है।
योग के सात प्रकार है- 1. कर्म योग 2. राज योग 3. हठयोग 4. भक्ति योग 5. कुण्डिलिनी योग 6. मंत्र योग 7. ज्ञान योग।
योग क्रिया के अभ्यास में यम का पालन करना आवश्यक होता है।
यम की मुख्य 5 क्रियाएं है- 1. अहिंसा अर्थात किसी भी प्राणी को मन, वाणी एवं शरीर से कष्ट नहीं देना 2. सत्य बोलना और किसी से छल-कपट नहीं करना 3. चोरी नहीं करना 4. संयम रखना 5. ब्रह्मचर्य। योगाभ्यास के लिए 5 नियम हैं- 1. शौच 2. संतोष 3. तपस 4. स्वाध्याय 5. सिद्धांत।
योग के आठ अंग होते हैं. यम, नियम, प्रत्याहार, आसन, प्राणायाम, धारणा, ध्यान, समाधि। इन सभी को मिलाकर योग बनता है। आसन से हमारा शरीर स्वस्थ होता है। प्राणायाम से हमारे शरीर में रजिस्टेंश पॉवर बढ़ती है। इससे इतनी रजिस्टेंश पॉवर आ जाती है कि बाहर का रोग अंदर आना बंद हो जाता है। प्रत्याहार में हम अपनी पांचों ज्ञानेन्द्रियों को कंट्रोल करने का अभ्यास करते हैं जैसे- आंख देखने के लिए, कान सुनने के लिए, नाक सूंघने के लिए, जीभ स्वाद लेने के लिए और त्वचा स्पर्श करने के लिए होती है। अब हमें इन पर नियंत्रण करना है- उदाहरण के लिए- पेट भरा हुआ है लेकिन सामने रसगुल्ला पड़ा हुआ है और हम स्वाद में खाते जा रहे हैं। हम ये नहीं देख रहे कि यह कितना नुकसान करेगा। इसका अर्थ है जीभ पर हमारा नियंत्रण नहीं है। धारणा में हम अपने को कॉनंस्ट्रेट करना सीखते हैं। यदि हमने अपने जीवन का कोई टारगेट बना लिया तो हम उसके अनुसार कार्य करते जाएंगे और सफल होते जाएंगे। इसके द्वारा हम अपने जीवन की प्लानिंग करते हुए आगे बढ़ते रहेंगे। ध्यान में हम अपने मन को अपनी मर्जी से एक स्थान पर केन्द्रित करने का अभ्यास करते हैं। यहां हम अपने मन को भटकने से रोकने की शक्ति पाते हैं। हम जहां चाहे वहां अपने ध्यान को केन्द्रित कर सकते हैं। इससे स्मरण शक्ति बढ़ती है, नर्वस-सिस्टम ठीक से कार्य करता है एवं सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है। दिमाग में नए-नए प्लान आते रहते हैं। ध्यान का अंतिम रूपसमाधि है। ये आठों मिलाकर योग कहलाते हैं। इनमें योगासन, प्राणायाम और ध्यान प्रमुख हैं।

गर्म और ठंडा एनिमा

जब गर्म और ठंडे एनिमा को साथ-साथ लिया जाता है अर्थात एक के बाद दूसरा तो उसे गर्म और ठंडा एनिमा कहते हैं। एनिमा लेने के लिए सबसे पहले हल्के गर्म पानी (जो सहन हो सके) का एनिमा लेना चाहिए और उसके बाद ठंडे पानी का एनिमा लेना चाहिए। गर्म और ठंडे दोनों ही एनिमाओं में प्रयोग में लाया जाने वाला जल एक समान मात्रा में होना चाहिए। गर्म और ठंडा दोनों ही प्रकार के एनिमाओं द्वारा आंतों में चढ़ाया हुआ पानी थोड़ी देर तक रखने के बाद एक साथ ही निकालना चाहिए। गर्म जल से एनिमा लेने से आंतों की दीवारों में चिपके हुए सुद्दे ढीले हो जाते हैं और इसके बाद ठंडे जल का एनिमा लेने से आंतों की अनावश्यक गर्मी नष्ट हो जाती है तथा इससे आंते मजबूत हो जाती हैं। ठंडे और गर्म जल का एनिमा नए रोगियों तथा कमजोर और असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए अधिक लाभकारी होता है।

Wednesday, February 27, 2013

मित्रो आप इन नियमो का पालण पूरी ईमानदारी सेअपनी ज़िंदगी मे करे !! ये नियमो का पालण न करने से ही बीमारियाँ ज़िंदगी मे आती हैं !!

सुबह उठते ही सबसे पहले हल्का गर्म पानी पिये!! 2 से 3 गिलास जरूर पिये !
पानी हमेशा बैठ कर पिये !
पानी हमेशा घूट घूट करके पिये !!
घूट घूट कर इसलिए पीना है ! ताकि सुबह की जो मुंह की लार है इसमे ओषधिए गुण बहुत है ! ये लार पेट मे जानी चाहिए ! वो तभी संभव है जब आप पानी बिलकुल घूट घूट कर मुंह मे घूमा कर पिएंगे !
इसके बाद दूसरा काम पेट साफ करने का है ! रोज पानी पीकर सुबह शोचालय जरूर जाये ! पेट का सहीढंग से साफ न होना 108 बीमारियो की जड़ है !
खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है !
हमेशा डेड घंटे बाद ही पानी पीएं!
खाना खाने के बाद अगर कुछ पी सकते हैं उसमे तीन चीजे आती हैं!!
1) जूस
2) छाज (लस्सी) या दहीं !
3) दूध
सुबह खाने के बाद अगर कुछ पीना है तो हमेशा जूस पिये !
दोपहर को दहीं खाये ! या लस्सी पिये !
और दूध हमेशा रात को पिये !!
इन तीनों के क्रम को कभी उल्टा पुलटा न करे !!
इसके इलावा खाने के तेल मे भूल कर भी refine oilका प्रयोग मत करे !(वो चाहे किसी भी कंपनी का क्यू न हो dalda ,ruchi,gagan)को ­ भी हो सकता है !
अभी के अभी घर से निकाल दें ! बहुत ही घातक है !
सरसों के तेल का प्रयोग करे ! या देशी गाय के दूध का शुद्ध घी खाएं ! ! (पतंजलि का सरसों का तेल एक दम शुद्ध है !(शुद्ध सरसों के तेल की पहचान है मुंह पर लगाते ही एक दम जलेगा ! और खाना बनाते समय आंखो मे हल्की जलन होगी !
चीनी का प्रयोग तुरंत बंद कर दीजिये ! गुड खाना का प्रयोग करे! या शक्कर खाये !! चीनी बहुत बीमारियो की जड़ ! slow poison है !)
खाने बनाने मे हमेशा सेंधा नमक या काला नमक का ही प्रयोग करे !! आयोडिन युक्त नमक कभी न खाएं !!
सुबह का भोजन सूर्य उद्य ! होने के 2 से 3 घंटे तक कर लीजिये ! (अगर 7 बजे आपके शहर मे सूर्य निकलता है ! तो 9 या 10 बजे तक सुबह का भोजन कर लीजिये ! इस दौरान जठर अग्नि सबसे तेजहोती है ! सुबह का खाना हमेशा भर पेट खाएं ! सुबह के खाने मे पेट से ज्यादा मन संतुष्टि होना जरूरी है ! इसलिए अपनी मनपसंद वस्तु सुबह खाएं !!
खाना खाने के तुरंत बाद ठीक 20 मिनट के लिए बायीं लेट जाएँ और अगर शरीर मे आलस्य ज्यादा है तो 40 मिनट मिनट आराम करे ! लेकिन इससे ज्यादा नहीं !
इसी प्रकार दोपहर को खाना खाने के तुरंत बाद ठीक 20 मिनट के लिए बायीं लेट जाएँ और अगर शरीर मे आलस्य ज्यादा है तो 40 मिनट मिनट आराम करे ! लेकिन इससे ज्यादा नहीं !
रात को खाना खाने के तुरंत बाद नहीं सोना ! रात को खाना खाने के बाद बाहर सैर करने जाएँ ! कम से कम 500 कदम सैर करे ! और रात को खाना खाने के कम स कम 2 घंटे बाद ही सोएँ !
ब्रह्मचारी है (विवाह के बंधन मे नहीं बंधे ) तो हमेशा सिर पूर्व दिशा की और करके सोएँ ! ब्रह्मचारी नहीं है तो हमेशा सिर दक्षिण की तरफ करके सोएँ ! उत्तर और पश्चिम की तरफ कभी सिर मत करके सोएँ !
मैदे से बनी चीजे पीज़ा ,बर्गर,hotdog, पूलड़ोग , आदि न खाएं ! ये सब मेदे को सड़ा कर बनती है !! कब्ज का बहुत बड़ा कारण है !!
इन सब नियमो का अगर पूरी ईमानदारी से प्रयोग करेंगे ! 1 से 2 महीने मे ऐसा लगेगा पूरी जिंदगी बदल गई है ! मोटापा है तो कम हो जाएगा ! hihgh BP, cholesterol, triglycerides,स ­ ब level परआना शुरू हो जाएगा ! HDLबढ्ने लगेगा ! LDL ,VL DL कम होने लगेगा !! और भी बहुत से बदलाव आप देखेंगे !!

संभोगशक्ति वढ़ाने वाले पकवान-



सिंघाड़े का हलवा- सबसे पहले लगभग 25 ग्राम सिंघाड़े का आटा, 25 ग्राम घी, 50 ग्राम चीनी और 250 ग्राम दूध ले लें। इसके बाद सिंघाड़े के आटे में घी डालकर हल्की आग पर लाल होने तक पकने के लिए रख दें। जब यह आटा अच्छी तरह से सिक जाए तो इसमें दूध डालकर पकाएं और हलुए की तरह सेक लें। जब यह गाढ़ा हो जाए तो इसमें चीनी डालकर चलाएं और तैयार होने के बाद नीचे उतार लें। इस हलुए को रोजाना सुबह नाश्ते में खाने और ऊपर से दूध पीने से वीर्य की बढ़ोतरी होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है।

छुआरे का हलुवा- छुआरे का हलुवा बनाने के लिए 50 ग्राम छुआरे. 50 ग्राम घी, 300 ग्राम दूध, 50 ग्राम पिसी हुई मिश्री और 2 इलायची के पीस ले लें। इसके बाद छुआरों के बीजों को निकाल लें और बीज निकले हुए छुआरों को 250 ग्राम दूध में उबाल लें तथा बारीक पीस लें। इसके बाद कड़ाही में घी डालकर पिसे हुए छुआरों को इसमें डालकर भून लें। जब यह लाल हो जाए तो इसमें दूध डालकर पकाएं और गाढ़ा हो जाने पर इसमें पिसी हुई मिश्री मिला लें। अब इसमें इलायची के दानों का पाउडर मिलाकर अच्छी तरह से मिला लें। अब हलुआ तैयार है। इस हलुए को पाचन शक्ति के अनुसार 30 से 60 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह-सुबह खाकर ऊपर से दूध पीने से शरीर में बल और वीर्य की मात्रा बढ़ती है, संभोग शक्ति तेज होती है और शरीर मजबूत बनता है। उड़द की खीर- उड़द की दाल को घी में भूनकर उसमें दूध डालकर पकाएं। जब खीर तैयार हो जाए तो उसमें चीनी मिलाकर नीचे उतार लें। इस खीर को रोजाना सुबह नाश्ते के रूप में सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी और संभोग करने की शक्ति तेज होती है।

Saturday, February 16, 2013

ऐसे खाएं दही तो इन बीमारियों का इलाज हो जाएगा अपने आप ------

ताजा दही सिर्फ टेस्टी ही नहीं होता बल्कि शरीर के लिए भी बहुत अधिक गुणकारी होता है। इसके विपरित खट्टा या पुराना दही शरीर को नुकसान पहुंचाता है।आज की भागदौड भरी जिंदगी में पेट की बीमारियों से परेशान होने वाले लोगों की संख्या सब से ज्यादा होती है। इस समस्या से परेशान लोग यदि अपनी डाइट में प्रचूर मात्रा में दही को शामिल करें तो अच्छा होगा। दही का नियमित सेवन करने से शरीर कई तरह की बीमारियों से मुक्त रहता है। दही में अच्छी किस्म के बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो शरीर को कई तरह से लाभ पहुंचाते हैं। पेट में मिलने वाली आंतों में जब अच्छे किस्म के बैक्टीरिया का अभाव हो जाता है, तो भूख न लगने जैसी तमाम बीमारियां पैदा हो जाती हैं।

इस के अलावा बीमारी के दौरान या एंटीबायोटिक थेरैपी के दौरान भोजन में मौजूद विटामिन और खनिज हजम नहीं होते। इस स्थिति में दही सबसे अच्छा भोजन बन जाता है। यह इन तत्वों को हजम करने में मदद करता है।

इससे पेट में होने वाली बीमारियां अपने आप खत्म हो जाती हैं। दही खाने से पाचनक्रिया सही रहती है, जिससे खुलकर भूख लगती है और खाना सही तरह से पच भी जाता है। दही खाने से शरीर को अच्छी डाइट मिलती है, जिस से स्किन में एक अच्छा ग्लो रहता है। मुंह के छालों पर दिन में 2-4 बार दही लगाने से छाले जल्द ही ठीक हो जाते हैं। शरीर के ब्लड सिस्टम में इन्फेक्शन को कंट्रोल करने में वाइट ब्लड सेल्स का महत्त्त्वपूर्ण योगदान होता है। दही खाने से वाइट ब्लड सेल्स मजबूत होते हैं, जो शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। लेकिन इसक ा सेवन कब और किस तरह करके ज्यादा लाभ उठा सकते हैं आइए जानते हैं कब और किस तरह इसका सेवन करके आप ज्यादा लाभ उठा सकते हैं।


- दही हमेशा ताजी ही प्रयोग करनी चाहिए।

- रात्रि में दही के सेवन को हल्का काला नमक,शक्कर या शहद के साथ ही किया जाना चाहिए।

- मांसाहार के साथ दही के सेवन को विरुद्ध माना गया है।

- दही दस्त या अतिसार के रोगियों में मल को बांधनेवाली होती है,पर सामान्य अवस्था में अभिस्यंदी अर्थात कब्ज कर सकती है।

- ग्रीष्मऋतु में जब लू चल रही हो तब दही की लस्सी ऊर्जा प्रदान करनेवाली तथा शरीर में जलीयांश की कमी को दूर करती है।

- नित्य सेवन से दही का प्रभाव शरीर के लिए सात्म्य होकर गुणकारी हो जाता है।

- मधुमेह से पीडि़त रोगियों में दही का सेवन संयम से करना चाहिए, इससे फायदा होता है।

- दही का सेवन कुछ आयुर्वेदिक औषधियों में सह्पान के साथ कराने का भी विधान है, जिससे दवा का प्रभाव बढ़ जाता है।

- दही का सेवन कोलाईटीस रोगियों के लिए रामबाण आयुर्वेदिक दवा है।

- बच्चों में ताजी दही पेट सम्बंधी विकारों को दूर करती है।

- दही एवं कच्चे केले को पकाकर आंवयुक्त अतिसार (म्युकोइड स्टूल ) को रोका जा सकता है।

- जब खांसी,जुखाम,टांसिल्स एवं, सांस की तकलीफ हो तब दही का सेवन न करें तो अच्छा।

- दही सदैव ताजीर एवं शुद्ध घर में मिटटी के बर्तन की बनी हो तो अत्यंत गुणकारी होती है।

- त्वचा रोगों में दही का सेवन सावधानी पूर्वक चिकित्सक के निर्देशन में करना चाहिए।

- मात्रा से अधिक दही के सेवन से बचना चाहिए।

- अर्श (पाईल्स ) के रोगियों को भी दही का सेवन सावधानीपूर्वक करना चाहिए।तो ऐसी है दही ,बड़ी गुणकारी,रोगों में दवा पर सावधानी से करें प्रयोग।

- दही के रोजाना सेवन से शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।

- दही में अजवाइन मिलाकर पीने से कब्ज की शिकायत दूर होती है।

- गर्मी के मौसम में दही की छाछ या लस्सी पीने से पेट की गर्मी शांत होती है। इसे पीकर बाहर निकले तो लू से भी बचाव होता है।

- दही पाचन क्षमता बढ़ाता है।

- दही में कैल्शियम प्रचुर मात्रा में होता है। इसे रोजाना खाने से पेट की कई बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं।

- दही का रोजाना सेवन सर्दी और साँस की नली में होने वाले इंफेक्शन से बचाता है।

- अल्सर जैसी बीमारी में दही के सेवन से विशेष लाभ मिलता है।

- मुँह में छाले होने पर दही के कुल्ला करने से छाले ठीक हो जाते हैं।

मानव का प्रकृति,वृक्षों और पौधों के साथ अटूट रिश्ता

मानव का प्रकृति,वृक्षों और पौधों के साथ सदियों से अटूट रिश्ता रहा है। वृक्ष, मानव जीवन का आधार है। केवल बढ़ते हुए प्रदूषण को रोकने में ही नहीं, बल्कि जलवायु एवं वातावरण के संतुलन में भी वृक्षों का योगदान सर्वोपरि है। वृक्षों से हमें फल, फूल, औषधि और लकड़ी आदि तो मिलता ही है, साथ ही घर और अपने आसपास पेड़-पौधे लगाना मनुष्य का धर्म है।
बागवानी का गृह-विन्यास और नगर-विन्यास से अटूट नाता है। हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा इससे संबंधित व्याख्या ज्योतिष और वास्तु संबंधी ग्रंथों में विस्तार से की गई है।ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार, हमारे सौरमंडल के विभिन्न ग्रहों का अलग-अलग प्रकार के वृक्षों पर आधिपत्य है। जो वृक्ष ऊंचे और मज़बूत तथा कठोर तने वाले (शीशम इत्यादि) हैं, उनपर सूर्य का विशेष अधिकार होता है। दूध वाले वृक्षों (देवदार इत्यादि) पर चंद्र का प्रभाव होता है। लता, वल्ली इत्यादि पर चंद्र और शुक्र का अधिकार होता है। झाड़ियों वाले पौधों पर राहू और केतू काविशेष अधिकार है। जिन वृक्षों में रस विशेष न हो, कमज़ोर, देखने में अप्रिय और सूखे वृक्षों पर शनि का अधिकार है।
सभी फलदार वृक्ष बृहस्पति के वर्ग में, बिना फल के वृक्षों पर बुध का और फल, पुष्प वाले चिकने वृक्षों पर शुक्र का अधिकार है। औषधीय जड़ी बूटियों का स्वामीचन्द्रमा है। आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली में किसी ग्रह के अधीन आने वाले वनस्पतियों और औषधियों से ही उस ग्रह-जनक रोग का उपचार किया जाता है।उदाहरण के लिए बुध हमारी याद्दाश्त का कारक है और ब्राह्री बूटी जो बुध के आधिपत्य में है उसका इस्तेमाल याद्दाश्त वाली दवाई के रूप में किया जाता है।
ग्रहों के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए मंत्रपाठ, हवन, ध्यान और उपाय संबंधी रत्नों का उपयोग किया जाता है। इन सभी के अत्यधिक मूल्यवान होने से कई बार ये सभी सामान्य जन की पहुंच से दूर होते हैं। ऐसे में कुछ पौधों की जड़ों का इस्तेमाल रत्नों के विकल्प के रूप में किया जाता है। वास्तुशास्त्र के ग्रंथों के अनुसार, पाकड़ का वृक्ष दक्षिण में, बड़ पश्चिम में, गूलर उत्तर में और पीपल पूर्व में हो, तो यह अशुभ है।
इसके विपरीत उत्तर में पाकड़, पूर्व में बड़, दक्षिण में गूलर और पश्चिम में पीपल शुभ है। गृह के समीप कांटेदार वृक्ष (बबूल आदि)होने से शत्रुभय, दूध वाले वृक्ष (आक, कटैली आदि) से धननाश और फलदार वृक्ष संतान के लिए हानिकारक होते हैं। इन वृक्षों को घरके पास नहीं लगाना चाहिए और उनकी लकड़ी भी घर में प्रयोग न करें। यदि इन वृक्षों को हटाना किसी कारण संभव न हो, तो इनके बीच में शुभदायक वृक्ष जैसे नागकेसर, अशोक, अरिष्ट, कटहल, शमी जैसे कोई वृक्ष लगा देने से दोष निवृत हो जाता है।
घर के पूर्व, उत्तर-पश्चिम या ईशान कोण में वाटिका या तालाब बनवाने से अत्यंत शुभ होता है। ईशान कोण की वाटिका में हल्के फूलों वाले पौधे, बेल और लताएं और औषधीय गुणों वाले पौधे जैसे तुलसी, आंवला इत्यादि लगाए जाने चाहिए। घर के आसपास नीम, अनार, अशोक, नारियल, सुपारी और घर के भीतर तुलसी, गुलाब, चंदन, मोगरा, चमेली और अंगूर के पौधे शुभ होते हैं। मकान से कुछ दूरी पर ईशान में आंवला, नैऋत्य में इमली, आग्नेय में अनार, उत्तर में कैथ व पाकड़, दक्षिण में गुलाब और पश्चिम में पीपल लगाना चाहिए।
हमारे शास्त्रों में वृक्षों की महत्ता और उपयोगिता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह पुण्यात्मा होता है और कभी नरक के दर्शन नहीं करता।
..................हर हर महादेव ...............जय अम्बे

Friday, February 15, 2013

========================================== * पूरे विश्व को सभ्यता हमने सिखाई और आज हम उनसे सभ्यता सिख रहे हैं ==========================================

ध्यान-साधना, योग, आयुर्वेद, ये सारी अनमोल चीजें हमारी विरासत थी लेकिन अंग्रेजों ने हम लोगों के मन में बैठा दिया कि ये सब फालतू कि चीज़े हैं और हम लोगों ने मान भी लिया पर आज जब उनको जरुरत पड़ रही हैं इन सब चीजों कि तो फिर से हम लोगों कि शरण में दौड़े-भागे आ रहे हैं और अब हमारा योग 'योगा' बनकर हमारे पास आया तब जाकर हमें एहसास हो रहा हैं कि जिसे हम कंचे समझकर खेल रहे थे, वो हीरा था। उस आयुर्वेद के ज्ञान को विदेशी वाले अपने नाम से पेटेंट करा रहे हैं जिसके बाद उसका व्यापारिक उपयोग हम नहीं कर पायेंगे। इस आयुर्वेद का ज्ञान इस तरह रच बस गया हैं हम लोगों के खून में कि चाहकर भी हम इसे भुला नहीं सकते ...आज भले ही बहुत कम ज्ञान हैं हमें आयुर्वेद का पर पहले घर कि हरेक औरतों को इसका पर्याप्त ज्ञान था तभी तो आज दादी माँ के नुस्खे या नानी माँ के नुख्से पुस्तक बनकर छप रहे हैं। उस आयुर्वेद की छाया प्रति तैयार करके अरबी वाले 'यूनानी चिकित्सा' का नाम देकर प्रचलित कर रहे हैं।

जिस समय पश्चिम में आदिमानवों ने कपडे पहनना सीखा था...उस समय हमारे यहाँ लोग पुष्पक विमान में उड़ा करते थे। आज अगर विदेशी वाले हमारे ज्ञान को अपने नाम से पेटेंट करा रहे हैं तो हमारी नपुंसकता के कारण ही ना ??
वो तो योग के ज्ञाता नहीं रहे होंगे विदेश में और जब तक होते तब तक स्वामी रामदेव जी आते नहीं तो ये किसी विदेशी के नाम से पेटेंट हो चुका होता....हमारी एक और महान विरासत हैं संगीत की जो माँ सरस्वती की देन हैं किसी साधारण मानवों की नहीं। फिर इसे हम तुच्छ समझकर इसका अपमान कर रहे हैं। याद हैं आज से साल भर पहले हमारे संगीत-निर्देशक ए.आर. रहमान (पहले नाम दिलीप कुमार) को संगीत के लिए आस्कर पुरूस्कार दिया गया था.....और गर्व से सीना चौड़ा हम भारतियों का जबकि मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे अपनों ने मुझे जख्म दिया और अंग्रेज उसमे नमक छिड़क रहे हैं और मेरे अपने उसे देखकर खुश हो रहे हैं।
किस तरह भीगा कर जूता मारा था अंग्रेजों ने हम भारतियों के सर पर और हम गुलाम भारतीय उसमे भी खुश हो रहे थे कि मालिक ने हमें पुरस्कार तो दिया..... भले ही वो जूतों का हार ही क्यों ना हों ?? अरे शर्म से डूब जाना चाहिए हम भारतियों को अगर रत्ती भर भी शर्म बची है तो ??
बेशक रहमान की जगह कोई सच्चा देशभक्त होता तो ऐसे आस्कर को लात मार कर चला आता ........क्योंकि वो पुरस्कार अच्छे संगीत के लिए नहीं दिए गए थे बल्कि उसने पश्चिमी संगीत को मिलाया था भारतीय संगीत में इसलिए मिला वो पुरस्कार....यानी कि भारतीय संगीत कितना भी मधुर क्यों न हों आस्कर लेना हैं तो पश्चिमी संगीत को अपनाना होगा........सीधा सा मतलब यह हैं कि हमें कौन सा संगीत पसंद करना हैं और कौन सा नहीं ये हमें अब वो बताएँगे .........इससे बड़ा और गुलामी का सबूत और क्या हो सकता हैं कि हम अपनी इच्छा से कुछ पसंद भी नहीं कर सकते......कुछ पसंद करने के लिए भी विदेशियों कि मुहर लगवानी पड़ेगी उस पर हमें.... जिसे क,ख,ग भी नहीं पता अब वो हमें संगीत सिखायेंगे जहाँ संगीत का मतलब सिर्फ गला फाड़कर चिल्ला देना भर होता हैं वो सिखायेंगे ??

ज्यादा पुरानी बात भी नहीं हैं ये ......हरिदास जी और उसके शिष्य तानसेन (जो अकबर के दरबारी संगीतज्ञ थे) के समय कि बात हैं जब राज्य के किसी भाग में सुखा और आकाल कि स्थिति पैदा हो जाती थी तो तानसेन को वहां भेजा जाता था वर्षा करने के लिए......तानसेन में इतनी क्षमता थी कि मल्हार गाके वर्षा करा दे, दीपक राग गाके दीपक जला दे और शीतराग से शीतलता पैदा कर दे तो प्राचीन काल में अगर संगीत से पत्थर मोम बन जाता था, जंगल के जानवर खींचे चले आते थे कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये बात कोई भी अनुभव कर सकता हैं की किस तरह दिनों-दिन संगीत-कला विलुप्त होती जा रही हैं .....और संगीत कला का गुण तो हम भारतियों के खून में हैं .......किशोर कुमार, उषा मंगेशकर, कुमार सानू जैसे अनगिनत उदाहरण हैं जो बिना किसी से संगीत की शिक्षा लिए बॉलीवुड में आये थे।
एक और उदहारण हैं जब तानसेन की बेटी ने रात भर में ही "शीत राग" सीख लिया था.......चूँकि दीपक राग गाते समय शरीर में इतनी ऊष्मा पैदा हो जाती हैं कि अगर अन्य कोई “शीत राग” ना गाये तो दीपक राग गाने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जायेगी और तानसेन के प्राण लेने के उद्द्येश्य से ही एक चाल चलकर उसे दीपक राग गाने के लिए बाध्य किया था उससे इर्ष्या करने वाले दरबारियों ने ..........और तानसेन भी अपनी मृत्यु निश्चित मान बैठे थे क्योंकि उनके अलावा कोई और इसका ज्ञाता (जानकार) भी नहीं था और रातभर में सीखना संभव भी ना था किसी के लिए पर वो भूल गए थे कि उनकी बेटी में भी उन्ही का खून था और जब पिता के प्राण पर बन आये तो बेटी असंभव को भी संभव करने कि क्षमता रखती हैं ...... तानसेन के ऐसे सैकड़ों कहानियां हैं पर ये छोटी सी कहानी मैंने आप लोगों को अपने भारत के महान संगीत विरासत कि झलक दिखने के लिए लिखी.......अब सोचिये कि ऐसे में अगर विदेशी हमें संगीत कि समझ कराये तो ऐसा ही हैं जैसे पोता, दादा जी को धोती पहनना सिखाये, राक्षस साधू-महात्माओं को धर्म का मर्म समझाए और शेर किसी हिरन को अपने पंजे में दबाये अहिंसा कि शिक्षा दे ......नहीं..??
हम लोगों के यहाँ सात सुर से संगीत बनता हैं इसलिए 'सात तारों से बना सितार' बजाते हैं हमलोग, लेकिन अंग्रेजों को क्या समझ में आ गया जो छह तार वाला वाध्य-यंत्र बना लिया और सितार कि तर्ज पर उन्सका नामकरण गिटार कर दिया ??

इतना कहने के बाद भी हमारे भारतीय नहीं मानेगे मेरी बात पर जब कोई अंग्रेज कहेगा कि उसने गायों को भारतीय संगीत सुनाया तो ज्यादा दूध लिया या जब शोध सामने आएगा कि भारतीय संगीत का असर फसलों पर पड़ता हैं और वे जल्दी-जल्दी बढ़ने लगते हैं तब हम विश्वास करेंगे.... क्यों ?? ये सब शोध अंग्रेज को भले आश्चर्यचकित कर दे पर अगर ये शोध किसी भारतीय को आश्चर्यचकित करते हैं तो ये दुःख: कि बात हैं।

हमारे देश वासियों को लगता हैं हम लोग पिछड़े हुए हैं जो हमारे यहाँ छोटे-छोटे घर हैं और दूसरी और अंग्रेज तकनीकी विद्या के कितने ज्ञानी हैं, वो खुशनसीब हैं जो उनके यहाँ इतनी ऊँची-ऊँची अट्टालिकाए (Buildings) हैं और इतने बड़े-बड़े पुल हैं........ इस पर मैं अपने देशवासियों से यहीं कहूँगा कि ऊँचे घर बनाना मज़बूरी और जरुरत हैं उनकी, विशेषता नहीं..... हमलोग बहुत भाग्यशाली हैं जो अपनी धरती माँ कि गोद में रहते हैं विदेशियों कि तरह माँ के सर पर चढ़ कर नहीं बैठते।
हम लोगों को घर के छत, आँगन और द्वार का सुख प्राप्त होता हैं .....जिसमें गर्मी में सुबह-शाम ठंडी-ठंडी हवा जो हमें प्रकृति ने उपहार-स्वरूप प्रदान किये हैं उसका आनंद लेते हैं और ठण्ड में तो दिन-दिन भर छत या आँगन में बैठकर सूर्य देव कि आशीर्वाद रूपी किरणों को अपने शारीर में समाते हैं, विदेशियों कि तरह धुप सेंकने के लिए नंगे होकर समुन्द्र के किनारे रेत पर लेटते नहीं हैं.............रही बात क्षमता कि तो जरुरत पड़ने पर हमने समुन्द्र पर भी पत्थरों का पुल बनाया था और रावण तो पृथ्वी से लेकर स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने कि तैयारी कर रहा था तो अगर वो चाहता तो गगनचुम्बी इमारते भी बना सकता था लेकिन अगर नहीं बनाया तो इसलिए कि वो विद्वान था।
तथ्यपूर्ण बात तो ये हैं कि हम अपनी धरती माँ के जितने ही करीब रहेंगे रोगों से उतना ही दूर रहंगे और जितना दूर रहेंगे रोगों के उतना करीब जायेंगे। हमारे मित्रों को इस बात कि भी शर्म महसूस होती हैं कि हम लोग कितने स्वार्थी, बेईमान, झूठे, मक्कार, भ्रष्टाचारी और चोर होते हैं जबकि अंग्रेज लोग कितने ईमानदार होते हैं ....हम लोगों के यहाँ कितनी धुल और गंदगी हैं जबकि उनके यहाँ तो लोग महीने में एक-दो बार ही झाड़ू मारा करते हैं.......तो जान लीजिये कि वैज्ञानिक शोध ये कहती हैं कि साफ़ सुथरे पर्यावरण में पलकर बड़े होने वाले शिशु कमजोर होते हैं, उनके अन्दर रोगों से लड़ने कि शक्ति नहीं होती दूसरी तरफ दूषित वातावरण में पलकर बढ़ने वाले शिशु रोगों से लड़ने के लिए शक्ति संपन्न होते हैं। इसका अर्थ ये मत लगा लीजियेगा कि मैं गंदगी पसंद आदमी हूँ, मैं भारत में गंदगी को बढ़ावा दे रहा हूँ ........मेरा अर्थ ये हैं कि सीमा से बाहर शुद्धता भी अच्छी नहीं होती और जहाँ तक भारत कि बात हैं तो यहाँ हद से ज्यादा गंदगी हैं जिसे साफ़ करने कि अत्यंत आवश्यकता हैं.......रही बात झाड़ू मारने कि तो घर गन्दा हो या ना हों झाड़ू तो रोज मारना ही चाहिए क्योंकि झाड़ू मारकर हम सिर्फ धुल-गंदगी को ही बाहर नहीं करते बल्कि अपशकुन को भी झाड -फुहाड़ कर बाहर कर देते हैं तभी तो हम गरीब होते हुए भी खुश रहते हैं।
भारतीय को समृद्धि कि सूची में पांचवे स्थान पर रखा गया था क्योंकि ये पैसे के मामले में भले कम हैं लेकिन और लोगो से ज्यादा सुखी हैं और जहाँ तक हमारे ऐसे बनने की बात है तो वो सब अंग्रेजों ने ही सिखाया है हमें, नहीं तो उसके आने के पहले हम छल-कपट जानते तक नहीं थे........उन्होंने हमें धर्म-विहीन और चरित्र-विहीन शिक्षा देना शुरू किया ताकि हम हिन्दू धर्म से घृणा करने लगे और ईसाई बन जाए।
उन्होंने नौकरी आधारित शिक्षा व्यवस्था लागू की ताकि बच्चे नौकरी करने कि पढाई के अलावा और कुछ सोच ही न पाए. इसका परिणाम तो देख ही रहे हैं कि अभी के बच्चे को अगर चरित्र, धर्म या देशहित के बारे में कुछ कहेंगे तो वो सुनना ही नहीं चाहता..........वो कहता है उसे अभी सिर्फ अपने कोर्स कि किताबों से मतलब रखना हैं और किसी चीज़ से कोई मतलब नहीं उसे......अभी कि शिक्षा का एकमात्र उद्द्येश्य नौकरी पाना रह गया हैं ....लोगो को किताबी ज्ञान तो बहुत मिल जाता हैं कि वो ……
डॉक्टर, इंजिनियर, वकील, आई.ए.एस. या नेता बन जाता हैं पर उसकी नैतिक शिक्षा न्यूनतम स्तर कि भी नहीं होती जिसका कारण रोज एक-से-बढ़कर एक अपराध और घोटाले करते रहते हैं ये लोग। अभी कि शिक्षा पाकर बच्चे नौकरी पा लेते हैं लेकिन उनका मानसिक और बौद्धिक विकास नहीं हो पाता हैं, इस मामले में वो पिछड़े ही रह जाते हैं जबकि हमारी सभ्यता में ऐसी शिक्षा दी जाती थी जिससे उस व्यक्ति के पूर्ण व्यक्तिगत का विकास होता था.....उसकी बुद्धि का विकास होता था, उसकी सोचने-समझने कि शक्ति बढती थी।
आज ये अंग्रेज जो पूरी दुनिया में ढोल पिट रहे हैं कि ईसाईयत के कारण ही वो सभ्य और विकसित हुए और उनके यहाँ इतनी वैज्ञानिक प्रगति हुई तो क्या इस बात का उत्तर हैं उनके पास कि कट्टर और रुढ़िवादी ईसाई धर्म जो तलवार के बल पर 25-50 कि संख्या से शुरू होकर पूरा विश्व में फैलाया गया, जो ये कहता हो कि सिर्फ बाईबल पर आँख बंदकर भरोसा करने वाले लोग ही स्वर्ग जायेंगे बाकी सब नर्क जाएंगे,,,जिस धर्म में बाईबल के विरुद्ध बोलने कि हिम्मत बड़ा से बड़ा व्यक्ति भी नहीं कर सकता वो इतना विकासशील कैसे बन गया ???
400 साल पहले जब गैलीलियों ने यूरोप की जनता को इस सच्चाई से अवगत कराना चाहा कि पृथ्वी सूर्य कि परिक्रमा करती हैं तो ईसाई धर्म-गुरुओं ने उसे खम्बे से बांधकर जीवित जलाये जाने का दंड दे दिया वो तो बेचारा क्षमा मांगकर बाल-बाल बचा। एक और प्रसिद्ध पोप, उनका नाम मुझे अभी याद नहीं, वे भी मानते थे कि पृथ्वी सूर्य के चारो और घुमती हैं लेकिन जीवन भर बेचारे कभी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए...उनके मरने के बाद उनकी डायरी से ये बात पता चली। क्या ऐसा धर्म वैज्ञानिक उन्नति में कभी सहायक हो सकता हैं ??? ये तो सहायक की बजाय बाधक ही बन सकता हैं।

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हिन्दू जैसे खुले धर्म को जिसे गरियाने की पूरी स्वतंत्रता मिली हुई हैं सबको, जिसमें कोई मूर्ति-पूजा करता हैं, कोई ध्यान-साधना, कोई तन्त्र-साधना, कोई मन्त्र-साधना ....... ऐसे अनगिनत तरीके हैं इस धर्म में, जिस धर्म में कोई बंधन नहीं ..जिसमें नित नए खोज शामिल किये जा सकते हैं और समय तथा परिस्थिति के अनुसार बदलाव करने की पूरी स्वतंत्रता हैं, जिसने सिर्फ पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला सिखाई, 'वसुधैव कुटुम्बकम' का नारा दिया, पूरे विश्व को अपना भाई माना, जिसने अंक शास्त्र, ज्योतिष-शास्त्र, आयुर्वेद-शास्त्र, संगीत-कला, भवन निर्माण कला, काम-कला आदि जैसे अनगिनत कलाएं तुम लोगों (ईसाईयों) को दी और तुम लोग कृतघ्न, जो नित्यकर्म के बाद अपने गुदा को पानी से धोना भी नहीं जानते, हमें ही गरियाकर चले गए।
अगर ईसाई धर्म के कारण ही तुमने तरक्की की तो वो तो 1800 साल पहले कर लेनी चाहिए थी, पर तुमने तो 200-300 साल पहले जब सबको लूटना शुरू किया और यहाँ (भारत) के ज्ञान को सीख-सीखकर यहाँ के धन-दौलत को हड़पना शुरू किया तबसे तुमने तरक्की की ऐसा क्यों ???
ये दुनिया करोडों वर्ष पुरानी हैं लेकिन तुम लोगों को 'ईसा और मुहम्मद' के पहले का इतिहास पता ही नहीं ......कहते हो बड़े-बड़े विशाल भवन बना दिए तुमने.....अरे जाओ, जब आज तक पिछवाडा धोना सीख ही नहीं पाए, खाना बनाना सीख ही नहीं पाए, जो की अभी तक उबालकर नमक डालकर खाते तो बड़े-बड़े भवन बनाओगे तुम। एक भी ग्रन्थ तुम्हारे पास-भवन निर्माण के ?? जो भी छोटे-मोटे होंगे वो हमारे ही नक़ल किये हुए होंगे।

प्रोफ़ेसर ओक ने तो सिद्ध कर दिया की भारत में जितने प्राचीन भवन हैं वो हिन्दू भवन या मंदिर हैं जिसे मुस्लिम शासकों ने हड़प कर अपना नाम दे दिया और विश्व में भी जो बड़े-बड़े भवन हैं उसमें हिन्दू शैली की ही प्रधानता हैं। ये भी हंसी की ही बात हैं की मुग़ल शासक महल नहीं सिर्फ मकबरे और मस्जिद ही बनवाया करते थे भारत में। जो हमेशा गद्दी के लिए अपने बाप-भाईयों से लड़ता-झगड़ता रहता था, अपना जीवन युद्ध लड़ने में बिता दिया करते थे उसके मन में अपने बाप या पत्नी के लिए विशाल भवन बनाने का विचार आ जाया करता था !! इतना प्यार करता था अपनी पत्नी से जिसको बच्चा पैदा करवाते करवाते मार डाला उसने !! मुमताज़ की मौत बच्चा पैदा करने के दौरान ही हुई थी और उसके पहले वो 14 बच्चे को जन्म दे चुकी थी ......जो भारत को बर्बाद करने के लिए आया था, यहाँ के नागरिकों को लूटकर, लाखों-लाख हिन्दुओं को काटकर और यहाँ के मंदिर और संस्कृतिक विरासत को तहस-नहस करके अपार खुशी का अनुभव करता था वो यहाँ कोई सृजनात्मक विरासत कार्य करे ये तो मेरे गले से नहीं उतर सकता। जिसके पास अपना कोई स्थापत्य कला का ग्रन्थ नहीं हैं वो भारत की स्थापत्य कला को देखकर ये कहने को मजबूर हो गया था की भारत इस दुनिया का आश्चर्य हैं इसके जैसा दूसरा देश पूरी दुनिया में कहीं नहीं हो सकता हैं, वो लोग अगर ताजमहल बनाने का दावा करते हैं तो ये ऐसा ही हैं जैसा 3 साल के बच्चे द्वारा दसवीं का प्रश्न हल करना।

दुःख तो ये हैं की आज़ाद देश आज़ाद होने के बाद भी मुसलमानों को खुश रखने के लिए इतिहास में कोई सुधर नहीं किये, हमारे मुसलमान और ईसाई भाइयों के मूत्र-पान करने वाले हमारे राजनितिक नेताओं ने। आज जब ये सिद्ध हो चूका हैं की ताजमहल शाहजहाँ ने नहीं बनवाया बल्कि उससे सौ-दो-सौ साल पहले का बना हुआ हैं तो ऐसे में अगर सरकार सच्चाई लाने की हिम्मत करती तो क्या हम भारतीय गर्व का अनुभव नहीं करते ? क्या हमारी हीन भावना दूर होने में मदद नहीं मिलती? ताजमहल साथ आश्चर्यों में से एक हैं ये सब जानते हैं पर सात आश्चर्यों में ये क्यों शामिल हैं ये कितने लोग जानते हैं ? इसके शामिल होने का कारण इसकी उत्कृष्ट स्थापत्य कला, इसकी अदभुत कारीगरी को अब तक आधुनिक इंजीनियर समझने की कोशिश कर रहे हैं। जिस प्रकार कुतुबमीनार के लौह-स्तम्भ की तकनीक को समझने की कोशिश कर रहे हैं......जो की अब तक समझ नहीं पाए हैं। (इस भुलावे में मत रहिएगा की कुतुबमीनार को कुतुबद्दीन एबक ने बनवाया था)...... मोटी-मोटी तो मैं इतना ही जानता हूँ की यमुना नहीं के किनारे के गीली मुलायम मिटटी को इतने विशाल भवन के भार को सेहन करने लायक बनाना, पूरे में सिर्फ पत्थरों का काम करना समान्य सी बात नहीं हैं .........इसको बनाने वाले इंजिनियर के इंजीनियरिंग प्रतिभा को देखकर अभी के इंजीनियर दांतों तले ऊँगली दबा रहे हैं। अगर ये सब बातें जनता के सामने आएगी तभी तो हम अपना खोया आत्मविश्वास प्राप्त कर पायेंगे ........1200 सालों तक हमें लूटते रहे, लूटते रहे, लूटते रहे और जब लुट-खसौट कर कंगाल कर दिया तब अब हमें एहसास करा रहे हों की हम कितने दीन-हीन हैं और ऊपर से हमें इतिहास भी गलत पढ़ा रहे हैं इस डर से की कहीं फिर से अपने पूर्वजों का गौरव इतिहास पढ़कर हम अपना आत्मविश्वास ना पा लें। अरे, अगर हिम्मत हैं तो एक बार सही इतिहास पढ़कर देखों हमें.....हम स्वाभिमानी भारतीय जो सिर्फ अपने वचन को टूटने से बचाने के लिए जान तक गवां देते थे इतने दिनों तक दुश्मनों के अत्याचार सहते रहे तो ऐसे में हमारा आत्म-विश्वास टूटना स्वभाविक ही हैं .....हम भारतीय जो एक-एक पैसे के लिए, अन्न के एक-एक दाने के लिए इतने दिनों तक तरसते रहे तो आज हीन भावना में डूब गए, लालची बन गए, स्वार्थी बन गए तो ये कोई शर्म की बात नहीं........ऐसी परिस्थिति में तो धर्मराज युधिष्ठिर के भी पग डगमगा जाएँ....आखिर युधिष्ठिर जी भी तो बुरे समय में धर्म से विचलित हो गए थे जो अपनी पत्नी तक को जुए में दावं पर लगा दिए थे।

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* चलिए इतिहास तो बहुत हो गया अब वर्तमान पर आते हैं *
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वर्तमान में आप लोग देख ही रहे हैं कि विदेशी हमारे यहाँ से डाक्टर-इंजिनियर और मैनेजर को ले जा रहे हैं इसलिए कि उनके पास हम भारतियों कि तुलना में दिमाग बहुत ही कम हैं। आप लोग भी पेपरों में पढ़ते रहते होंगे कि अमेरिका में गणित पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमी हो जाती हैं जिसके लिए वो भारत में शिक्षक की मांग करते हैं तो कभी ओबामा भारतीय बच्चो की प्रतिभा से डर कर अमेरिकी बच्चो को सावधान होने की नसीहत देते हैं । पूर्वजों द्वारा लुटा हुआ माल हैं तो अपनी कंपनी खड़ी कर लेते हैं लेकिन दिमाग कहाँ से लायेंगे....उसके लिए उन्हें यहीं आना पड़ता हैं ....हम बेचारे भारतीय गरीब पैसे के लालच में बड़े गर्व से उनकी मजदूरी करने चले जाते थे, पर अब परिस्थिति बदलनी शुरू हो गयी हैं। अब हमारे युवा भी विदेश जाने की बजाय अपने देश की सेवा करना शुरू कर दिए हैं ....वो दिन दूर नहीं जब हमारे युवाओं पर टिके विदेशी फिर से हमारे गुलाम बनेंगे। फिर से इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पूरे विश्व पर पहले हमारा शासन चलता था जिसका इतिहास मिटा दिया गया हैं ........लेकिन जिस तरह सालों पहले हुई हत्या जिसकी खूनी ने अपनी तरफ से सारे सबूत मिटा देने की भरसक कोशिश की हो, उसकी जांच अगर की जाती हैं तो कई सुराग मिल जाते हैं जिससे गुत्थी सुलझ ही जाती हैं, बिलकुल यहीं कहानी हमारे इतिहास के साथ भी हैं जिस तरह अब हमारे युवा विदेशों के करोड़ों रुपये की नौकरी को ठुकराकर अपने देश में ही इडली, बड़ा पाव सब्जी बेचकर या चालित शौचालय, रिक्शा आदि का कारोबार कर करोड़ों रुपये सालाना कम रहे हैं, ये संकेत हैं की अब हमारे युवा अपना खोया आत्म-विशवास प्राप्त कर रहे हैं और उनमे नेतृत्व क्षमता भी लौट चुकी हैं तो वो दीन भी दूर नहीं जब पूरे विश्व का नेतृत्व फिर से हम भारतियों के हाथों में होगा और हम पुन: विश्वगुरु के सिंहासन पर आसीन होंगे। जिस तरह हरेक के लिए दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है वैसे हम लोगों के 1200 सालों से ज्यादा रात का समय कट चुका हैं अब दिन निकल आया हैं ...इसका उदाहरण देख लो भारत का झारखंड राज्य जहां जनसँख्या 3 करोड़ की नहीं हैं और यहाँ 14,000 करोड़ का घोटाला हो जाता हैं फिर भी ये राज्य प्रगति कर रहा है।

इसलिए अपने पराधीन मानसिकता से बाहर आओ, डर को निकालों अपने अन्दर से हमें किसी दूसरे का सहारा लेकर नहीं चलना हैं। खुद हमारे पैर ही इतने मजबूत हैं की पूरी दुनिया को अपने पैरों तले रौंद सकते हैं हम ...हम वही हैं जिसने विश्वविजेता का सपना देखने वाले सिकन्दर का दंभ चूर-चूर कर दिया था। गौरी को 13 बार अपने पैरों पर गिराकर गिडगिडाने को मजबूर किया और जीवनदान दिया। जिस प्रकार बिल्ली चूहे के साथ खेलती रहती हैं वैसे ही ये दुर्भाग्य था हमारा जो शत्रू के चंगुल में फंस गए क्योंकि उस चूहे ने अपनों की ही सहायता ले ली पर हमने उसे छोड़ा नहीं, अँधा हो जाने के बावजूद भी उसे मारकर मरे........जिस प्रकार जलवाष्प की नन्ही-नन्ही पानी की बूंदें भी एकत्रित हो जाने पर घनघोर वर्षा कर प्रलय ला देती है, अदृश्य हवा भी गति पाकर भयंकर तबाही मचा देती है, नदी-नाले की छोटी लहरें नदी में मिलकर एक होती है तो गर्जना करती हुई अपने आगे आने वाली हरेक अवरोधों को हटाती हुई आगे बढती रहती है वैसे ही मैं अभी भले ही जलवाष्प की एक छोटी सी बूंद हूँ, पर अगर आप लोग मेरा साथ दो तो इसमें कोई शक नहीं की हम भारतीय फिर से इस दुनिया को अपने चरणों में झुका देंगे....... और मुझे पता हैं दोस्त.........मेरे जैसी करोड़ों बूंदें एकृत होकर बरसने को बेकरार हैं इसलिए अब और ज्यादा विलंब ना करो और मेरे हाँथ में अपना हाँथ दो मित्र और अगर किसी को इस लेख से किसी भी प्रकार की चोट पहुंचाई तो उसके लिए भी क्षमा मांगता हूँ।

मैं गर्व से कह सकता हूँ मैं भारतीय हूँ

Thursday, February 14, 2013

मस्सा का उपचार


अमेरिका में लाखों लोग त्वचा की समस्याओं से ग्रसित रहते हैं। इनमे से कुछ समस्याएँ गंभीर होती हैं, और कुछ गौण समझी जाती हैं, और इन गौण समस्याओं में से एक समस्या होती है, मस्से। यह सिर्फ गौण ही नहीं बल्कि आम समस्याओं में गिनी जाती है। मस्से त्वचा पर एक उपज की तरह होते हैं, और सुसाध्य समझे जाते हैं, यानि कि वे कैंसरयुक्त नहीं होते। इसके बावजूद इनसे ग्रसित कई लोग इन्हें निकालने के लिए आतुर रहते हैं, क्योंकि उनके अनुसार मस्से त्वचा पर अच्छे नहीं दिखते।

यह बात आप शायद न जानते हों कि मस्से 'ह्युमन पैपिल्लोमा वाइरस' के कारण विकसित होते हैं।

मस्सों के लक्षण

त्वचा पर बेडौल और रुखी सतह का विकास होना, मस्सों के लक्षण होते हैं। मस्से अपने आप विकसित होकर अपने आप ही गायब हो जाते हैं, पर इनमे से कई मस्से अत्याधिक पीड़ादायक होते हैं। यह तेज़ी से फैलते हैं, और इनमे से कई मस्से बरसों तक बने रहते हैं जिनका इलाज कराना ज़रूरी होता है।

मस्सों के आयुर्वेदिक / घरेलू उपचार
• बरगद के पेड़ के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। इस प्रयोग से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने आप गिर जाते हैं।
• एक चम्मच कोथमीर के रस में एक चुटकी हल्दी डालकर सेवन करने से मस्सों से राहत मिलती है।
• कच्चे आलू का एक स्लाइस नियमित रूप से दस मिनट तक मस्से पर लगाकर रखने से मस्सों से छुटकारा मिल जायेगा।
• केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। और ऐसा दिन में दो बार करें और लगातार करते रहें जब तक कि मस्से ख़तम नहीं हो जाते।
• अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगायें। इससे मस्से नरम पड़ जायेंगे, और धीरे धीरे गायब हो जायेंगे। अरंडी के तेल के बदले कपूर के तेल का भी प्रयोग कर सकते हैं।
• लहसून के एक टुकड़े को पीस लें, लेकिन बहुत महीन नहीं, और इस पीसे हुए लहसून को मस्से पर रखकर पट्टी से बांध लें। इससे भी मस्सों के उपचार में सहायता मिलती है।
• एक बूँद ताजे मौसमी का रस मस्से पर लगा दें, और इसे भी पट्टी से बांध लें। ऐसा दिन में लगभग 3 या 4 बार करें। ऐसा करने से मस्से गायब हो जायेंगे।
• बंगला, मलबारी, कपूरी, या नागरबेल के पत्ते के डंठल का रस मस्से पर लगाने से मस्से झड़ जाते हैं। अगर तब भी न झड़ें, तो पान में खाने का चूना मिलाकर घिसें।
• अम्लाकी को मस्सों पर तब तक मलते रहें जब तक मस्से उस रस को सोख न लें। या अम्लाकी के रस को मस्से पर मल कर पट्टी से बांध लें.
• कसीसादी तेल मस्सों पर रखकर पट्टी से बांध लें।
• मस्सों पर नियमित रूप से प्याज़ मलने से भी मस्से गायब हो जाते हैं।
• पपीता के क्षीर को मस्सों पर लगाने से भी मस्सों के गायब होने में मदद मिलती है।
• थूहर का दूध या कार्बोलिक एसिड सावधानीपूर्वक लगाने से मस्से निकल जाते हैं।
• मस्सों पर अलो वेरा को दिन में तीन बार लगायें। ऐसा एक सप्ताह तक करते रहें, मस्से गायब हो जायेंगे।
• विटामिन मे को मस्सों पर लगाने से भी लाभ मिलता है। दुगने लाभ के लिए आप उसपर कच्चा लहसून भी लगा सकते हैं। दोनों को मस्सों पर लगाकर उसपर पट्टी बांधकर एक सप्ताह तक रहने दें। एक सप्ताह बाद पट्टी खोलने पर आप पाएंगे की मस्से गायब हो गए हैं।
 

ये प्रयोग करने से हेल्थ बनी रहेगी और दिमाग तेज चलेगा

वसंत पंचमी पर ब्राह्मी सेवन का विशेष महत्व माना गया है। ब्राह्मी एक ऐसी जड़ी बूटी है जिसे आयुर्वेद में बहुत उपयोगी माना गया है। ब्राह्मी तराई वाले स्थानों पर उगती है। बुद्धि तथा उम्र को बढ़ाती है। यह रसायन के समान होती है। ब्राह्मी में एल्केलाइड तथा सेपोनिन नामक दो मुख्य: जैव सक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं। इसमें पाए जाने वाले दो मुख्य एल्केलाइड हैं ब्राह्मीन तथा हरपेस्टिन जबकि बेकोसाइड ए तथा बी मुख्य सेपोनिन हैं।

गुणों की दृष्टि से - ब्राह्मी में पाए जाने वाले एल्केलाइड स्ट्रिकनीन के समान हैं परन्तु यह उसकी तरह विषाक्त नहीं होती। ब्राह्मी में बोटूलिक अम्ल, स्टिग्मा स्टेनॉल, बीटा-साइटोस्टीरॉल तथा टेनिन आदि भी पाए जाते हैं। हरे पत्तों में प्राय: एल्केलाइड तथा उड़नशील तेल पाए जाते हैं जबकि सूखे पौधों में सेण्टोइक एसिड तथा सेण्टेलिंक एसिड भी पाए जाते हैं। बुखार को खत्म करती है। याददाश्त को बढ़ाती है।

इन बड़ी बीमारियों में फायदेमंद˜-
सफेद दाग, पीलिया, प्रमेह और खून की खराबी को दूर करती है। खांसी, पित्त और सूजन को रोकती है। बैठे हुए गले को साफ करती है। ब्राह्मी का उपयोग दिल के लिए लाभदायक होता है। यह मानसिक पागलपन को दूर करता है। सही मात्रा के अनुसार इसका सेवन करने से निर्बुद्ध, त्रिकालदर्शी यानी भूत, भविष्य और वर्तमान सब दिखाई देने लगते हैं। ब्राह्मी घृत, ब्राही रसायन, ब्राही पाक, ब्राह्मी तेल, सारस्वतारिष्ट, सारस्वत चूर्ण आदि के रूप में प्रयोग किया जाता हैं।

हिस्टीरिया जैसे रोगों में यह तुरन्त प्रभावी होती है जिससे सभी लक्षण तुरन्त नष्ट हो जाते हैं। चिन्ता तथा तनाव में ठंडाई के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त किसी बीमार या अन्य बीमारी के कारण आई निर्बलता के निवारण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। कुष्ठ और चर्म रोगों में भी यह उपयोगी है। खांसी तथा गला बैठने पर इसके रस का सेवन काली मिर्च तथा शहद के साथ करना चाहिए।

दिल का दोस्त
ब्राह्मी बुद्धि और उम्र को बढ़ाती है। यह रसायन के समान होती है। यह बुखार को खत्म करती है, याददाश्त को बढ़ाती है। सफेद दाग, पीलिया, खून की खराबी को दूर करती है। खांसी, पित्त और सूजन को रोकती है। यह मानसिक रोगों में भी लाभकारी है और दिल के लिए भी फायदेमंद। ब्राह्मी को यह नाम उसके बुद्धिवर्धक होने के गुण के कारण दिया गया है। इसे जलनिम्ब भी कहते हैं, क्योंकि यह प्रधानत: जलासन्न भूमि में पाई जाती है।

कब्ज और गठिया में फायदेमंद
यह कई तरह के रोगों में फायदेमंद साबित होती है। यह कब्ज को दूर करती है। इसके पत्ते के रस को पेट्रोल के साथ मिलाकर लगाने से गठिया दूर होती है। ब्राह्मी में रक्तशोधक गुण भी पाये जाते हैं। यह हृदय के लिए भी पौष्टिक होती है।

कार्यक्षमता बढ़ाए
ब्राह्मी के पौधे के सभी भाग उपयोगी होते हैं। जहां तक हो सके ब्राह्मी को ताजा ही प्रयोग करना चाहिए। ब्राह्मी का प्रभाव मुख्यत: मस्तिष्क पर पड़ता है। यह मस्तिष्क के लिए टॉनिक है ही, उसे शान्ति भी देती है। लगातार मानसिक कार्य करने से थकान हो जाने पर जब व्यक्ति की कार्यक्षमता घट जाती है तो ब्राह्मी के उपयोग से आश्चर्यजनक लाभ होता है।

स्मृति बढ़ाए
मिर्गी के दौरों तथा उन्माद में भी ब्राह्मी बहुत लाभकारी होती है।
सही मात्रा में इसका सेवन करने से याददाश्त दुरुस्त होती है। अल्पमंदता में ब्राह्मी का रस या चूर्ण पानी या मिसरी के साथ रोगी को दिया जाना चाहिए।
ब्राह्मी के तेल की मालिश से मस्तिष्क की दुर्बलता तथा खुश्की दूर होती है तथा बुद्धि बढ़ती है।बच्चों को खांसी या छोटी उम्र में क्षयरोग होने पर छाती पर इसका गर्म लेप करना चाहिए, लाभ होता है।

क्यो खराब नहीं होता है गंगा का जाल

इसलिए खराब
नहीं होता गंगाजल
सहारनपुर। गंगा जल आखिर खराब
क्यों नहीं होता ? पतित पावनी गंगा नदी का नाम
आते ही ये सवाल अक्सर दिमाग
को खटखटा देता है। लेकिन इसका भी... जवाब
मिल गया है।
दरअसल, हिमालय की कोख गंगोत्री से
निकली गंगा का जल इसलिए कभी खराब
नहीं होता, क्योंकि इसमें गंधक, सल्फर, खनिज
की सर्वाधिक मात्रा पाई जाती है। राष्ट्रीय जल
विज्ञान संस्थान रूड़की के निदेशक डाॅ.
आरडी सिंह ने बताया कि हरिद्वार में गोमुख
गंगोत्री से आ रही गंगा के जल की गुणवत्ता पर
इसलिए कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यह
हिमालय पर्वत पर उगी हुई अनेकों जीवन
दायनि उपयोगी जड़ी बुटियों के ऊपर से स्पर्श
करता हुआ आता है।
अन्य कारण भी
वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. मुकेश कुमार शर्मा ने
बताया कि गंगा जल खराब नहीं होने के कई
वैज्ञानिक कारण भी हैं। एक यह कि गंगा जल में
बैट्रिया फोस नामक एक बैक्टीरिया पाया गया है,
जो पानी के अंदर रासायनिक क्रियाओं से
उत्पन्न होने वाले अवांछनीय
पदार्थों को खाता रहता है। इससे जल
की शुद्धता बनी रहती है। दूसरा गंगा के पानी में
गंधक की प्रचुर मात्रा मौजूद रहती है, इसलिए
भी यह खराब नहीं होता।
गंगा को मैला हमने बनाया
डाॅ. सिंह ने बताया कि गंगा हरिद्वार से आगे
अन्य शहरों की ओर बढ़ती जाती है वैसे ही शहरों,
नगर निगमों और खेतीबाड़ी का कूड़ा करकट
तथा औद्योगिक रसायनों का मिश्रण गंगा में डाल
दिया जाता है। यही वजह है कि कानपुर,
वाराणसी और इलाहाबाद का गंगा जल आज पीने
योग्य नहीं रह गया है।

बड़ा कौन माता पिता या भगवान ??????????

बड़ा कौन माता पिता या भगवान ये सवाल काफी समय से मेरे दिमाग में चल रहा था. लेकिन मेरे एक मित्र ने इसका हल बताया क्या वो ठीक है आप बताये ,
आजकल भारत देश में वर्द्धाआश्रमों की बाढ़ सी आई हुई है , जयादातर बच्चे अपने माता पिता को आश्रमों में छोड़ रहे है . जो बच्चे अपने माता पिता को अपनी निजता में दखल मानते है . उनकी बीमारी,नाकारापन ,चिडचिडापन और हर बात में टोका टोकी को बर्दाश्त न कर पाने की सूरत में इनको आश्रमों में छोडा आना ही उचित समझते है , इससे उन माता पिताओं पर क्या गुजरती होगी जो अपने बच्चो से बड़ी बड़ी आशाये लगाये हुए होते है , मेरा भी एक मित्र अखलेश इसी तरह का है जिसने अपने माता पिता को आश्रम में भेज दिया है और खुद अपनी पत्नी और तीन बच्चो के साथ एक बढ़िया बंगले में रहता है , भगवान का इतना बड़ा भगत है की जहा भी मंदिर दिखे वहा दर्शन करना और देवी देवताओ के कार्यो के लिए धन लुटा उसकी आदत में शुमार है ,यानि भगवान जहाँ है सब कुछ वहां है
उसके विपरीत मेरा दूसरा दोस्त अरुण अपने माता पिता को भगवान से बड़ा मानता है , वो उनके लिए कुछ भी करने को आतुर रहता है जब अरुण की शादी हुई तो अरुण ने अपनी पत्नी यानि मेरी भाभी से एक ही बात कही सुमन मेरे माता पिता मेरे भगवान है कयोकी इन्होने मुझे जन्म दिया है और जो पैदा करता है उससे बड़ा कोई नहीं होता है. संस्कार ,उंच नीच और भगवान के बारे में वही बताते है . जो हमें ज्ञान माता पिता देते है हम उसी के आधार पर अपना जीवन बिताते है , अगर आज तुम माता पिता का आदर करोगी तो कल हमारे बच्चे भी हमारा सम्मान करेगे , और जीवन भर हमारी देखभाल करेगे . जब मेने अरुण से पूछा तो बोला अनिल भाई आप 'हम' आम इंसानों की तो बात छोडिये 'भगवान' ने खुद अपने माता पिता को ही बड़ा बताया है , श्री गणेश जी को तो पुरे ब्रहम्मांड का चक्कर काटे बिना देवताओ का सिर मोर बना दिया गया , क्योकि उन्होंने अपने माता पिता यानि भगवान महादेव और माता पार्वती के चारो और चक्कर काट लिया था , वही भगवान मर्यादा पुरषोतम श्री राम ने अपने अपने पिता के वचन के खातिर अपना सारा राज पाट त्याग दिया तो आप इस बात से अंदाजा लगाये ,
जब भगवान अपने माता पिता को बड़ा मानते है , फिर हम क्यों नहीं मान सकते है , हाँ में भगवान को मानता जरुर हु पूजा अर्चना भी करता हु लेकिन अपने माता पिता की अनदेखी कर के नहीं . हां शायद अरुण की बात मेरे समझ में तो आई , और मेने अपने माता पिता से अपनी पुरानी गलतियों की माफ़ी भी मांगी और उन्होंने मुझे माफ़ भी कर दिया .
में आप सभी पढने वालो से में आशा करता हूँ की इस लेख को पढने के बाद आप उन व्यक्तियो को जरुर समझाए जो अपने माता पिता का ध्यान नहीं रखते है और उन्हें माता पिता की अहमियत जरुर समझाए

माता-पिता का घर सर्वोच्च तीर्थ

लोग अपने घर में मौजूद भगवान रूपी माता-पिता को छोडक़र उन अदृश्य भगवान की खोज में तीर्थस्थलों पर मारे-मारे फिरते है. या अपने घर में मौजूद मॉ को दुखी छोडक़र पूरी रात मां का जागरण कराने के लिए बेताब रहते है. यह एक सच है कि जब तक बच्चें घर नहीं आते, मां को नींद नहीं आती. ऋषि-मुनियों की सर्वोच्चतम कल्पना शक्ति के बल पर रचित बेहतरीन रचनाओं पर विश्वास किया जाए, तो हर काम की शुरूआत गणेश जी की आरती से करने वालों को गणेश जी पर विश्वास तो करना चाहिए. ब्रमाण्ड में सर्वश्रेष्ठ कौन को लेकर गणेश जी ने ब्रमाण्ड की परिक्रमा करने की बजाए अपने बुद्घि कौशल के बल पर अपने माता-पिता की परिक्रमा कर सर्वप्रथम पूज्य का सम्मान हासिल कर लिया था. माता-पिता का दर्जा तो भगवान से भी ऊपर होता है, और सबसे बड़ा तीर्थस्थल वह होता है, जहां यह दोनों वास करते है. माना कि सृष्टि को चलाने वाले भगवान है, पर उनका अस्तित्व तो सिर्फ कल्पनाओं में ही है, उनको आज तक किसी ने साकार रूप में देखा नहीं. हमारे ऋषि-मुनि बहुत अव्वल श्रेणी के लेखक थे. उनकी कल्पना शक्ति की कोई थाह नहीं थी. तभी तो उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में तीन किरदारों का इतना बेहतरीन वर्णन करते हुए महाकाव्यों की रचना कर दी कि आने वाली पीढिय़ों को भगवान के अस्तित्व पर यकीन हो गया. साथ ही चित्रकारों ने इन ऋषि-मुनियों की कथाओं के किरदारों का अपनी कल्पना के आधार ऐसा चित्रण किया कि वो सजीव हो गए और सदियों से इस जगत के प्राणी हे भगवान, हे भगवान करते हुए उनकी एक झलक को यहां-वहां भटक रहे है. इन चित्रों में सबसे बड़ी बात देखने को मिलती है कि भगवान का बाल रूप, युवावस्था तो दिखाई देती है पर कभी भगवान का वृद्घावस्था का चित्र नहीं दिखता. यह तो सृष्टि का कटु सत्य है कि जो उत्पन्न हुआ है, उसका क्षरण होगा ही, और आज तक ऐसा ही होता आया है. तो फिर हमारे 84 करोड़ देवी-देवताओं में किसी एक का भी वृद्घावस्था का चित्र क्यों नहीं दिखता. सच्चाई यह है कि भगवान को कभी किसी ने देखा तक नहीं, बस अपनी कल्पना के आधार पर भगवान भगवान करते हुए अपने अधे-कचरे ज्ञान के भरोसे सीधी-साधी जनता को सदियों से बेवकूफ बनाते चले जा रहे है. कभी सोचिए इन विद्घानों या राजा-महाराजाओं को द्वारा स्थापित तीर्थस्थलों में प्रतिदिन के हिसाब से करोड़ो-अरबों की संपत्ति का चढ़ावा आता है. क्या इस सम्पत्ति का उपभोग सिर्फ भगवान करते है, नहीं यह संपत्ति तो सिर्फ इन व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार जमाने वालों के ऐशोआराम के लिए ही एकत्रित की जाती है. दूसरी ओर यह पब्लिक है, सब जानती है का दावा करने वाली पब्लिक हकीकत में कुछ नहीं जानती है. वह सिर्फ उस अदृश्य भगवान के प्यार में पागल होकर अपने माता-पिता के जीवन को कष्टमय करते हुए इन महापोंगापंथी पंडितों के ऐशोआराम की हर चीज उपलब्ध कराने के लिए तीर्थस्थलों पर अपनी खूनपसीने की कमाई को खुले हाथों से लूटा कर चली आती है, और कहती दानपुण्य भी करना चाहिए. अब कोई सोचो वह दानपुण्य भी किस काम का जब अपने माता-पिता ही खुश न हो सके. यहां पर एक बात हो सकती है. अगर अपने माता-पिता को सुख-सुविधा की हर चीज उपलब्ध कराने की हैसियत न हो तो कम से कम उनको दुख तो न दिया जाए, जबकि आजकल कितने ही माता-पिता अपने बच्चों की करनी का फल भुगतते थाना, कचहरी या अस्पताल में थानेदार, वकील या डॉक्टर के पास गिड़गिड़ाते नजर आ ही जाते है, जबकि दूसरी ओर उनके सुपुत्र या पुत्रवधू किसी पंडित या ज्योतिषी की शरण में अपने कष्टों के निवारण के लिए अच्छी खासी दक्षिणा के साथ बैठे रहते है. जबकि दूसरी ओर हमारे जनक हमारे सामने साक्षात मौजूद है. अगर भगवान न होते तो तब भी हम इस धरती पर आते, क्योंकि हमारे माता-पिता ने हमको जन्म देने का फैसला कर दिया था. आज हम इतने मतलबी क्यों होते जा रहे है कि उनके शेष जीवन को सुखमय करने की बजाय दुःखमय बनाते जा रहे है. यहां पर कुछ अपवाद हो सकते है.

Wednesday, February 13, 2013

वसंत पंचमी पर विशेष बुद्धिम् प्रदाम् शारदाम्

सरस्वती, विद्या और बुद्धि की देवी हैं। उन्हीं से हमें पवित्रता, शुद्धि, समृद्धि और शक्ति प्राप्त होती है। प्राचीन ग्रंथों में इनका संबंध यज्ञीय देवता इड़ा और भारती से भी जोड़ा गया है। इनका प्रिय वर्ण श्वेत है, जो सात्विकता, सहजता और सरलता का प्रतीक है। यह वर्ण ईर्ष्या और क्रोध से परे रहकर शुद्ध ज्ञान का भी प्रतीक है। सरस्वती के वस्त्र भी श्वेत हैं और उनका आसन भी श्वेत कमल है। उनका वाहन श्वेत राजहंस है, जो नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक है। मां सरस्वती का यह व्यक्तित्व ज्ञान की अभिलाषा और शांति की लालसा रखने वाले किसी भी भक्त को अपनी ओर आकर्षित करने में समर्थ है। माघ शुक्ल पंचमी को वसंत पंचमी (इस वर्ष 15 फरवरी) के दिन मां सरस्वती का आविर्भाव माना जाता है। तद्नुसार इसी दिन सरस्वती के वार्षिक पूजन का विधान है।
विश्व के आदिग्रंथ ऋग्वेद में सरस्वती का वर्णन है। प्रारंभ में सरस्वती का वर्णन पवित्र नदी के रूप में किया गया, जिसके किनारे बैठकर ऋषियों-मुनियों ने मंत्रों की रचना की और वैदिक साहित्य की नींव रखी। बाद में इन्हें नदी देवता के रूप में स्वीकार किया गया और फिर इन्हें वाग्देवी के रूप में मान्यता मिली। ऋग्वेद में ही इन्हें पावक अर्थात सबको पवित्र करने वाली और 'शंतमा' अर्थात शांति देने वाली और सबका कल्याण करने वाली देवी भी कहा गया। सरस्वती के उपासकों में भी हमें इसी गुण की अपेक्षा रहती है। विद्या की प्राप्ति व्यक्ति को नम्र और विनयी बनाती है। सरस्वती, भारती और इड़ा- इन तीन देवियों को ऋग्वेद (10.110.8) में 'तियो देवी' की भी संज्ञा दी गयी। अर्थात ऋग्वेद काल से ही देवी के रूप में सरस्वती को मान्यता मिल गयी थी। कालांतर में ब्राह्मण ग्रंथों (शतपथ ब्राह्मण 3.9.1 तथा ऐतरेय ब्राह्मण 3.1) में इस रूप का और अधिक विकास हुआ। शतपथ ब्राह्मण (14.2.1,12) में स्पष्ट रूप से कहा गया- 'वाक वै सरस्वती'। उपनिषद काल में तो मुख्यत: सरस्वती पर ही एक उपनिषद की भी रचना कर दी गयी- सरस्वती रहस्योपनिषद।
पुराणों में सरस्वती के अनेक रूपों की चर्चा की गयी है। उनके जन्म के बारे में भी अनेक विचारधाराएं सामने आयीं। एक विचारधारा के अनुसार स्वयं ईश्वर के मुख से सरस्वती का जन्म हुआ, इसीलिए इनका नाम वाणी रखा गया। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार सरस्वती का जन्म पार्वती के शरीरकोष से हुआ, इसीलिए इनका एकनाम कौशिकी पड़ गया। देवी भागवत के अनुसार सरस्वती का जन्म श्रीकृष्ण की जिह्वा से हुआ और उन्होंने ही सरस्वती पूजा को प्रचारित किया।
प्राचीन संस्कृत साहित्य में सरस्वती का ब्रह्मा से विशेष संबंध है। ब्रह्मा सम्पूर्ण सृष्टि के रचयिता और रक्षक हैं। वे आदिपुरुष हैं। सृष्टि में सर्वप्रथम उन्हीं का आविर्भाव हुआ तथा बाद में उन्होंने सृष्टि का निर्माण किया। सृष्टि निर्माण से संबंधित विभिन्न कथाएं पुराणों में हैं। एक कथा के अनुसार ब्रह्मा के दायें भाग से स्वायम्भुव मनु तथा बाएं भाग से शतरूपा उत्पन्न हुईं। यही दोनों सृष्टि के जन्मदाता बने। ब्रह्मा की पत्नी के रूप में ब्रह्माणी का नाम लिखा जाता है, जो उनकी शक्ति भी है। ब्रह्माणी के बारे में विशेष विवरण प्राप्त नहीं होता, लेकिन एक कथा के अनुसार ब्रह्मा ने स्वयं अपने शरीर के एक हिस्से से जिस नारी का निर्माण किया और जिसका नाम शतरूपा था, उसी को ब्रह्माणी भी कहा गया। सरस्वती के बारे में यह भी कहा गया कि ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने के कारण वे ब्रह्मा की पुत्री हैं और इसी रूप में उन्हें वाग्देवी कहा जाता है। सरस्वती प्रकारांतर में ज्ञान की ही प्रतीक हैं।
गायत्री उस मंत्र का नाम है जिसकी रचना ऋषि विश्वामित्र ने पुष्कर में की थी और जिसे सावितृ देव को अर्पित किया गया था। इस गायत्री मंत्र को आज भी हिन्दू समुदाय अपने लिए अत्यंत पवित्र और बुद्धि का दाता मानता है। घर-घर में इस मंत्र का पाठ किया जाता है और इस मंत्र से यज्ञ भी किये जाते हैं। इस तथ्य से हमें यह जानकारी मिलती है कि ये तीनों देवियां- सावित्री, गायत्री और सरस्वती समान रूप में बुद्धि और सद्गुणों की प्रतीक हैं। इसलिए पुष्कर में आयोजित तपस्या के महाकुंभ में आदिपुरुष ब्रह्मा के साथ इन तीनों का संदर्भ में आना सहज स्वाभाविक है। सावित्री, गायत्री और सरस्वती- ये तीनों देवियां ज्ञान की प्रतीक हैं और ब्रह्मा ज्ञान के मूल स्रोत हैं। ज्ञान के उपासक हम सब हैं और इस रूप में हम सब सरस्वती के भक्त और पुत्र हैं तथा सृष्टि के पितामह ब्रह्मा सरस्वती के भी पिता हैं।
अन्य देवी-देवताओं के समान सरस्वती के चित्रों में भी उनके चार हाथ दर्शाए जाते हैं। उनके दो हाथ वीणा थामने और उसे बजाने में व्यस्त हैं। तीसरे में पुस्तक तथा चौथे में माला है। वीणा, संगीत और अन्य सभी प्रकार की कलाओं की प्रतीक हैं। सरस्वती की कृपा के बिना कोई भी व्यक्ति किसी भी विद्या में श्रेष्ठ कलाकार नहीं बन सकता। पुस्तक उस ज्ञान की प्रतीक है, जिसकी स्वामिनी स्वयं सरस्वती हैं। ज्ञान की देवी के रूप में ही मां सरस्वती की आराधना अधिकांश शिक्षण संस्थाओं में की जाती है। परीक्षाओं में बैठने वाले छात्र-छात्राएं भी अपना शिक्षण कार्य प्रारंभ करने से पहले मां सरस्वती का स्मरण करना आवश्यक समझते हैं। माला अध्यात्म और निष्ठा की प्रतीक है, जिसके अभाव में कोई भी शिक्षण कार्य सफल नहीं हो सकता।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी सर्वप्रथम मां सरस्वती की आराधना प्रस्तुत की जाती है। सरस्वती की अभिव्यक्ति हमारे प्रत्येक शब्द में होती है। वह शब्द चाहे लिखा जाए और चाहे बोला जाए। इसलिए हिन्दुओं में अधिकांशत: किसी भी प्रकार के ज्ञान की प्राप्ति के लिए सरस्वती का आशीर्वाद आवश्यक माना जाता है। कभी-कभी सरस्वती के एक हाथ में माला के स्थान पर कमंडलु भी दिखलाई देता है जो इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान का भंडार अक्षय होता है। वह कभी समाप्त नहीं होता। विश्वभर को ज्ञान बांटने के बाद भी ज्ञान का कमंडलु भरा ही रहता है। यह केवल ज्ञान की विशेषता है, धन या अन्य वस्तुओं की नहीं।
सरस्वती की वार्षिक पूजा के लिए माघ शुक्ल पंचमी (वसंत पंचती) का दिन विशेष रूप से निर्धारित किया गया है। इस समय का वासन्तिक वातावरण ज्ञान की देवी सरस्वती की उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ अवसर प्रदान करता है। अनेक स्थानों पर बालकों का विद्यारंभ भी इसी दिन से किया जाता है। शिक्षण संस्थाओं में इस दिन विशेष कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम भी सम्पन्न होते हैं। सरस्वती पूजन कहीं सरस्वती के चित्र के सामने और कहीं उनके प्रतीक के रूप में कलम-दवात के सामने किया जाता है। कहीं-कहीं आश्विन शुक्ल नवमी को भी पुस्तकों के रूप में सरस्वती का पूजन किया जाता है। सामान्यत: यह पूजन सप्तमी से दशमी तक चार दिन चलता है। मां सरस्वती का ध्यान इस मंत्र के साथ किया जाता है-
या कुन्देन्दुतुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा, या श्वेत पद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकर प्रभृतिभिर्देवै:सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा।।

गाय की बहु-उपयोगिता-

गाय की बहु-उपयोगिता-
..."गावः पवित्रं परमं
गावो मांगल्यमुत्तमम् ।
गावः स्वर्गस्य सोपानं
गावो धन्याः सनातनाः।।"

'गायें परम पवित्र, परम मंगलमयी, स्वर्ग
का सोपान, सनातन एवं धन्यस्वरूपा हैं।'
...

'गाय पशु नहीं बल्कि सुंदर अर्थतन्त्र है।'
गाय का देश की अर्थव्यवस्था में
भी काफी महत्त्व है। गाय का दूध, घी,
मक्खन, झरण (गौमूत्र), गोबर
आदि सभी जीवनोपयोगी तथा लाभकारी चीजें
हैं।

इतना ही नहीं, गाय के रोएँ और
निःश्वास भी मानव-जीवन के लिए आवश्यक
हैं। इस बात की पुष्टि वैज्ञानिकों ने
भी अपने प्रयोगों से की है।

गाय के शरीर से निकलने वाली सात्त्विक
तरंगे पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त
करती हैं तथा वातावरण में फैले रोगों के
कीटाणुओं को नष्ट करती हैं।

गाय के शरीर
से गूगल की गंध निकलती है, जो प्रदूषण
को नष्ट करती है।

गाय और उसके बछड़े के रँभाने की आवाज से
मनुष्य की अनेक मानसिक
विकृतियाँ तथा रोग अपने-आप नष्ट
हो जाते हैं।

गाय की पीठ पर रोज सुबह-शाम 15-20
मिनट हाथ फेरने से ब्लडप्रेशर (रक्तचाप)
नियंत्रित (संतुलित) हो जाता है।

गाय अपने निःश्वास में ऑक्सीजन
छोड़ती है। डा. जूलिशस व डॉ. बुक
(कृषि वैज्ञानिक जर्मनी)।

गाय अपने सींग के माध्यम से कॉस्मिक
पावर ग्रहण करती है।

एक थके माँदे व तनावग्रस्त
व्यक्ति को स्वस्थ एवं सीधी गाय के नीचे
लिटाने से उसका तनाव एवं थकावट कुछ
ही मिनटों में दूर हो जाती है
तथा व्यक्ति पहले से ज्यादा ताजा एवं
स्फूर्तियुक्त हो जाता है। (वैज्ञानिक
पावलिटा, चेक यूनिवर्सिटी)।

पृथ्वी पर आने वाले भूकम्पों में से अधिकांश
ई.पी.वेव्स से ही आते हैं, जो प्राणियों के
कत्ल के समय उत्पन्न दारूण वेदना एवं
चीत्कार से निःसृत होती है। - डॉ.
मदनमोहन बजाज व डॉ. विजय राज सिंह
(भौतिकी व खगोल विभाग के रीडर,
दिल्ली वि.वि.)

गाय के ताजे गोबर से टी.बी.
तथा मलेरिया के कीटाणु मर जाते हैं।

गोबर में हैजे के कीटाणुओं को मारने
की अदभुत क्षमता है। डॉ. किंग, मद्रास।

अमेरिका के वैज्ञानिक जेम्स मार्टिन ने
गाय के गोबर, खमीर और समुद्र के
पानी को मिलाकर ऐसा उत्प्रेरक
बनाया है, जिसके प्रयोग से बंजर
भूमि हरी-भरी हो जाती है एवं सूखे तेल के
कुओं में दोबारा तेल आ जाता है।

शहरों में निकलने वाले कचरे पर गोबर
का घोल डालने से दुर्गंध
पैदा नहीं होती एवं कचरा खाद में
परिवर्तित हो जाता है। - डॉ. कांती सेन
सर्राफ, मुम्बई।

♥ गौमांस खाने वाले सावधानः

युनानी चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार
गाय का गोश्त बड़ा कड़ा होता है, यह
जल्दी नहीं पचता। आदमी के पेट के माफिक
नहीं है। इससे खून गाढ़ा होता है और
उन्माद, पीलिया, घाव एवं कोढ़
आदि बीमारियाँ हो जाती हैं।

गाय आय का साधन भी है,
आरोग्यदात्री भी है। अतः गाय मारने
योग्य नहीं है बल्कि हर प्रकार से गोवंश
की रक्षा व उसका संवर्धन अत्यन्त आवश्यक
है।

Tuesday, February 12, 2013

हनुमान प्रश्नावली चक्र:

{मित्रो इस यंत्र को पूरी आस्था के साथ सभी मित्रो से साझा करे...जय सियाराम..जय जय हनुमान}
हर व्यक्ति के मन में अपने भविष्य के प्रति कई प्रश्न होते हैं। वह हमेशा उन प्रश्नों के उत्तर की खोज में लगा रहता है लेकिन उन प्रश्नों का उत्तर मिलना बहुत कठिन होता है। ऐसे में हनुमान ज्योतिष के माध्यम से हर प्रश्न का उत्तर आसानी से जाना जा सकता है। इस आर्टिकल के साथ हनुमान प्रश्नावली चक्र प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें आपके हर प्रश्न का उत्तर छिपा है।

उपयोग विधि
जिसे भी अपने प्रश्नों का उत्तर चाहिए वे स्नान आदि कर साफ वस्त्र धारण करे और पांच बार ऊँ रां रामाय नम:मंत्र का जप करने के बाद 11 बार ऊँ हनुमते नम:मंत्र का जप करे। इसके बाद आंखें बंद हनुमानजी का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक(खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक को देखकर अपने प्रश्न का उत्तर देखें।

कोष्ठकों के अंकों के अनुसार फलादेश

1- आपका कार्य शीघ्र पूरा होगा।

2- आपके कार्य में समय लेगगा। मंगलवार का व्रत करें।

3- प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तो कार्य शीघ्र पूरा होगा।

4- खोटे मनुष्यों का साथ छोड़ दें कार्य पूर्ण होने में संदेह है|

5- कार्य शीघ्र होगा, किंतु अन्य व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ेगी।

6- कोई व्यक्ति आपके कार्यों में रोड़े अटका रहा है, बजरंग बाण का पाठ करें।

7- आपके कार्य में किसी स्त्री की सहायता अपेक्षित है।

8- आपका कार्य नहीं होगा, कोई अन्य कार्य करें।

9- कार्यसिद्धि के लिए यात्रा करनी पड़ेगी।

10- मंगलवार का व्रत रखें और हनुमानजी को चोला चढ़ाएं, तो मनोकामना पूर्ण होगी।

11- आपकी मनोकामना शीघ्र पूरी होगी। सुंदरकांड का पाठ करें।

12- आपके शत्रु बहुत हैं। कार्य नहीं होने देंगे।

13- पीपल के वृक्ष की पूजा करें। एक माह बाद कार्य सिद्ध होगा।

14- आपको शीघ्र लाभ होने वाला है। मंगलवार को गाय को गुड़-चना खिलाएं।

15- शरीर स्वस्थ रहेगा, चिंताएं दूर होंगी।

16- परिवार में वृद्धि होगी। माता-पिता की सेवा करें और रामचरितमानस के बालकाण्ड का पाठ करें।

17- कुछ दिन चिंता रहेगी। ऊँ हनुमते नम: मंत्र की प्रतिदिन एक माला का जप करें।

18- हनुमानजी के पूजन एवं दर्शन से मनोकामना पूर्ण होगी।

19- आपको व्यवसाय द्वारा लाभ होगा। दक्षिण दिशा में व्यापारिक संबंध बढ़ाएं।

20- ऋण से छुटकारा, धन की प्राप्ति तथा सुख की उपलब्धि शीघ्र होने वाली है। हनुमान चालीसा का पाठ करें।
21- श्रीरामचंद्रजी की कृपा से धन मिलेगा। श्रीसीताराम के नाम की पांच माला रोज करें।

22- अभी कठिनाइयों का सामाना करना पड़ेगा पर अंत में विजय आपकी होगी।

23- आपके दिन ठीक नहीं है। रोजाना हनुमानजी का पूजन करें। मंगलवार को चोला चढ़ाएं। संकटों से मुक्ति मिलेगी।

24- आपके घर वाले ही विरोध में हैं। उन्हें अनुकूल बनाने के लिए पूर्णिमा का व्रत करें।

25- आपको शीघ्र शुभ समाचार मिलेगा।

26- हर काम सोच-समझकर करें।

27- स्त्री पक्ष से आपको लाभ होगा। दुर्गासप्तशती का पाठ करें।

28- अभी कुछ महीनों तक परेशानी है।

29- अभी आपके कार्य की सिद्धि में विलंब है।

30- आपके मित्र ही आपको धोखा देंगे। सोमवार का व्रत करें।

31- संतान का सुख प्राप्त होगा। शिव की आराधना करें व शिवमहिम्नस्तोत्र का पाठ करें।

32- आपके दुश्मन आपको परेशान कर रहे हैं। रोज पार्थिव शिवलिंग का पूजन कर शिव ताण्डवस्तोत्र का पाठ करें। सोमवार को ब्राह्मण को भोजन कराएं।

33- कोई स्त्री आपको धोखा देना चाहती है, सावधान रहें।

34- आपके भाई-बंधु विरोध कर रहे हैं। गुरुवार को व्रत रखें।

35- नौकरी से आपको लाभ होगा। पदोन्नति संभव है, पूर्णिमा को व्रत रख कथा कराएं।

36- आपके लिए यात्रा शुभदायक रहेगी। आपके अच्छे दिन आ गए हैं।

37- पुत्र आपकी चिंता का कारण बनेगा। रोज राम नाम की पांच माला का जप करें।

38- आपको अभी कुछ दिन और परेशानी रहेगी। यथाशक्ति दान-पुण्य और कीर्तन करें।

39- आपको राजकार्य और मुकद्मे में सफलता मिलेगी। श्रीसीताराम का पूजन करने से लाभ मिलेगा।

40- अतिशीघ्र आपको यश प्राप्त होगा। हनुमानजी की उपासना करें और रामनाम का जप करें।
41- आपकी मनोकामना पूर्ण होगी।

42- समय अभी अच्छा नहीं है।

43- आपको आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

44- आपको धन की प्राप्ति होगी।

45- दाम्पत्य सुख मिलेगा।

46- संतान सुख की प्राप्ति होने वाली है।

47- अभी दुर्भाग्य समाप्त नहीं हुआ है। विदेश यात्रा से अवश्य लाभ होगा।

48- आपका अच्छा समय आने वाला है। सामाजिक और व्यवसायिक क्षेत्र में लाभ मिलेगा।

49- आपका समय बहुत अच्छा आ रहा है। आपकी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होगी।

निषिद्ध पुष्प

भगवान् पर चढ़ाया हुआ पुष्प 'निर्माल्य' कहलाता है | सूंघा हुआ (केवल भौंरे के सूंघने से पुष्प दूषित नहीं होता ) या अंग पर लगाया हुआ पुष्प भी इसी श्रेणी में आता है, अत: इन्हें भगवान् पर न चढ़ाएं | जो पुष्प अपवित्र पात्र में रख दिया हो, जो अपवित्र स्थान में उत्पन्न हो, आग से झुलस गया हो, कीड़ों से दूषित हो, सुंदर नहीं हो, जिसकी पंखुडियां बिखर गयी हो, जो पृथ्वी पर गिर पड़ा हो [ केवल हर सिंगार (पारिजात) के पुष्प भूमि पर गिरने से भी दूषित नहीं होते] , जो पूर्णतः खिला न हो अर्थात कली [कलिओं को चढ़ाना मना है, परन्तु यह नियम कमल की कली पर लागू नहीं होता, केवल कमल ही ऐसा पुष्प है जिसकी कली भी चढ़ाई जा सकती है ] , जो निर्गंध हो अथवा अत्यधिक तेज गंध वाला हो और जो पुष्प बायें हाथ से, अधोवस्त्रों पर, आक और रेंड के पत्ते पर रख कर लाया गया हो, वह पुष्प त्याज्य हैं | ऐसे पुष्पों को देव प्रतिमा पर न चढ़ाएं... और निर्माल्य को भी किसी सुंदर प्रवाह में प्रवाहित कर दें अथवा ऐसी जगह रख दें जिससे यह पैरों में न आयें... निर्माल्य पर , विशेषकर शिव-निर्माल्य पर, पैर रखने से बड़ा भारी दोष होता है | पूजा के समय रखी गयी ऐसी कुछ सावधानिओं से हम अपना जीवन भी सुंदर बना सकते हैं...
जय श्री कृष्ण... पार्वती पतये हर हर महादेव...

आज भारत मे हो रही 100% बीमारियो का कारण हमारा गलत और अज्ञानता पूर्वक किया गया भोजन है ....

आज भारत मे हो रही 100% बीमारियो का कारण हमारा गलत और अज्ञानता पूर्वक किया गया भोजन है है जिसे हम tv और filmo से प्रभावित होकर करने लगे है 
जैसे की शक्कर -आयोडिन नमक आदि आदि 
बात अगर हम शक्कर की करे तो भारत वासी पिछले 250 साल से इसका सेवन करने लगे परिणाम आपकी आंखो के सामने है 8.50 लाख लोगो को शुगर की बीमारी और करीब 60 करोड़ लोगो को bp की कम या ज्यादा होने की बीमारी 
शक्कर मे सल्फर (बारूद )मिला होता है जो शरीर मे जाकर हमारे पाचन तंत्र को प्रभावित करता है और हमारे शरीर की सारी ऊर्जा जो हम दिन भर खाकर प्राप्त करते है उसे खत्म करने लगता है हमारे शरीर की सारी ऊर्जा शकर को पचाने मे ही खत्म हो जाती है और इसके गंभीर परिणाम हमारे शरीर को भुगतना पड़ते है कई बीमारिया हो जाती है आज से दौ सौ पचास साल पहले हमारे देश मे बीमारिया नहीं होती थी गंभीर बीमारियो की तो बात ही दूर है 



इसलिए आइये पवित्र भारत की पवित्र जीवन परम्पराओ की और 


गुड़ का सेवन करने से शरीर में होने वाले कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। मिठाई और चीनी की अपेक्षा गुड़ अधिक लाभकारी है। आज कल चीनी का प्रयोग अधिक होने के कारण से गुड़ के उपयोग कम ही हो रहा है। गन्ने के रस से गुड़ बनाया जाता है। गुड़ में सभी खनिज द्रव्य और क्षार सुरक्षित रहते हैं।


गुड़ से कई प्रकार के पकवान बनाये जाते हैं जैसे- हलुआ, चूरमा तथा लपसी आदि। गुड़ खाने से थकावट मिट जाती है। परिश्रमी लोगों के लिए गुड़ खाना अधिक लाभकारी है। मटके में जमाया हुआ गुड़ सबसे अच्छा होता है।

पुराना गुड़ का गुण : पुराना गुड़ हल्का तथा मीठा होता है। यह आंखों के रोग दूर करने वाला, भुख को बढ़ने वाला, पित्त को नष्ट करने वाला, शरीर में शक्ति को बढ़ाने वाला और वात रोग को नष्ट करने वाला तथा खून की खराबी को दूर करने वाला होता है।
गुड़ का प्रयोग दूसरे पदार्थों के साथ सेवन करने पर इसके गुण :


अदरक के साथ गुड़ खाने से कफ खत्म होता है। हरड़ के साथ इसे खाने से पित्त दूर होता है तथा सोंठ के साथ गुड़ खाने से वात रोग नष्ट होता है।

रंग : गुड़ का रंग लाल पीला, काला और सफेद होता है।

स्वाद : गुड़ का स्वाद मीठा होता है।

स्वरूप : गन्ने का रस निकालकर इसे आग पर पकाकर गुड़ बनाया जाता है।

वैज्ञानिक मतानुसार : 100 ग्राम गुड़ में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग खनिज द्रव्य होता है। चीनी में खनिज द्रव्यों और क्षारों का अभाव होता है। इसलिए चीनी की अपेक्षा गुड़ खाना अधिक लाभकारी होता है। गुड़ में बिटामिन `बी´-1, `बी´-2, विटामिन `सी´ और अल्पमात्रा में विटामिन `ए` होता है।

प्रकृति : गुड़ की प्रकृति गर्म होती है।

दोषों को दूर करने वाला : वंशलोचन गन्ना के दोषों को दूर करता है एवं गुड़ के गुणों को भी सुरक्षित रखता है।

गुण : गुड़ पेट को हल्का तथा साफ करता है। यह आंतों के घावों को ठीक करने में लाभकारी है तथा सर्दी-जुकाम की अवस्था में इसका सेवन करना अधिक फायदेमन्द होता है। यह कफ को नष्ट करता है तथा हाजमें को बढ़ाता है। गुड़ खांसी और सांस को रोकता है। इसका जला हुआ खार खांसी को दूर करता है।

तुलना : गुड़ की तुलना शहद के साथ की जा सकती है।
विभिन्न भाषाओं में गुड़ का नाम :-
संस्कृत गुड़
हिन्दी गुड़
अंग्रेजी जेगरी
बंगाली गुड़
मराठी गूल
गुजराती गोड़
तेलगू वेल्लामु
फारसी कन्देसिया
अरबी कन्देअस्वद .

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