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Sunday, February 24, 2013

दिगविजय सिह के कारनामे प्रमाणित

पढ़िए और लोगो को जानकारी दीजिये !!
दिग्विजय सिंह उर्फ़ दिग्गी राजा अपने हिन्दू
विरोधी विचारों ,और बेतुके बयानों के लिए जाने
जाते हैं .सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं
कि दिग्गी को सभी हिन्दू संगठनों से घोर
एलर्जी है .चाहे वह आर एस एस हो या बी जे
पी चाहे बाबा रामदेव
हों या अन्ना हजारे .दिग्गी कि नजर में वे सब
लोग आतंकवादी और भ्रष्ट हैं ,जो भ्रष्टाचार
का विरोध करता हो .लोग यह भी जानते हैं
कि दिग्गी ने मध्य प्रदेश के मुख्य
मंत्री की कुर्सी फिर से हथियाने के लिए
चापलूसी और खुशामदखोरी की हदें पर कर
दी हैं. अपनी इसी स्वामीभक्ति के कारण वह
पार्टी के महामंत्री और उत्तर प्रदेश के चुनाव
प्रभारी बनाये गए है .कान्ग्रेसिओं की नजर में
दिग्गी एक वरिष्ठ निष्ठावान,और पार्टी के
प्रति समर्पित नेता हैं . लेकिन यदि कोई यह कहे
कि दस साल तक मध्य प्रदेश के मुख्य
मंत्री रहते हुए ,दिग्गी ने खुद कांग्रस
को चूना लगाया ,भोपाल स्थित कांग्रेस के
कार्यालय "जवाहर भवन 'को फर्जी ट्रस्ट
बनाकर अपने क़ब्जे में कर लिया ,भवन से
लगी हुई दुकानों का किराया हड़प कर
लिया ,अदालत में झूठा शपथ पत्र दिया ,अपने
लोगों को फर्जी कंपनिया बना कर
रुपयों का घोटाला किया ,पार्टी में
अपराधियों को संरक्षण
दिया .तो कांग्रेसी ऐसा कहने वाले को फ़ौरन
आर एस एस का आदमी कह देंगे ,और अगर कोई
यह कहे कि दिग्विजय सिंह सार्वजनिक रूप से
इंदिरा गाँधी को "राजनीतिक वेश्या "और
सोनिया को "फोरेन"यानी विदेशी कहता था ,तो कांग्रेसी उस
व्यक्ति को बाबा रामदेव ,या अन्ना हजारे
का चमचा कह देंगे.
लेकिन यह सब आरोप
किसी संघी या बाबा रामदेव के आदमी ने
नहीं ,बल्कि मध्य प्रदेश कांगेस पार्टी के चेयर
मेन Chairman ने लगाये हैं जो सन 1978 से
1993 तक पार्टी में बने रहे .और
उनको Minister Status का दर्जा प्राप्त था .
यही नहीं ,यह व्यक्ति राजीव गांधी के
काफी निकट थे .इनके कार्यकाल में अर्जुन सिंह
और दिग्विजय सिंह एम् .पी में मुख्य
मंत्री रहे .इन महोदय का नाम श्री आर.
एम् .भटनागर है .आज इनकी आयु 76 के लगभग
है .भटनागर जी ने दिग्विजय पर जो भी आरोप
लगाये हैं .वह उन्होंने शपथ पूर्वक बताये
हैं .जिनकी पुष्टि ,अखबारों ,विधानसभा के
रिकार्ड ,और प्रमाणिक गुप्त दस्तावेजों से
होती है .यही श्री भटनागर ने इसकी सूचना Top
Secret पत्र दिनांक 9 अगस्त 1998 और
दिनांक 29 सितम्बर 2001
को सोनिया को देदी थी .यह खबर इंदौर से
साप्ताहिक "स्पुतनिक "ने अपने अंक 42 वर्ष
47 औरदिनांक 31 जनवरी -6 फरवरी के
अखबार में विस्तार में छापी थी.
अब हम दिग्विजय के कुछ
कारनामों का सप्रमाण एक एक करके
भंडा फोड़ेंगे जैसे
1 जवाहर भवन की संपत्ति हड़प करना
2 अपने लोगों को नाजायज फायदा पंहुचाना
3 अपराधियों को संरक्षण देना
4 इंदिरा गाँधी के लिए वेश्या कहना .
1 -जवाहर भवन की संपत्ति गबन करना
दिग्विजय सिंह ने पहला घोटाला कांग्रेस
की सम्पति को हड़प करने का किया था .सन
2006 से पूर्व म.प्र काग्रेस कमेटी का मुख्य
कार्यालय लोक निर्माण विभाग के एक शेड में
कहता था. बादमे मद्य प्रदेश कांग्रेस
कमिटी को अपना भवन बनाने हेतु म.प्र. आवास
और पर्यावरण विभाग ने आदेश क्र.
3308 /4239 दिनांक 30 /11 /74 और
पुनर्स्थापित आदेश दिनांक 30 अगस्त 1980
तथा आदेश दिनांक 20 /11 81 द्वारा रोशन
पूरा भोपाल के नुजूल शीट क्रमांक 3 प्लाट 7 में
5140 वर्ग फुट जमीं बिना प्रीमियम के एक
रूपया वार्षिक भूभाट लेकर स्थायी पट्टे पर
आवंटित कर दिया था .और उस भूखंड
का विधिवत कब्ज़ा कांग्रस कमिटी को नुजूल से
लेकर 23 /11 81 को सौप दिया .भवन निर्माण
हेतु सदस्यों और किरायेदारों से
जो रुपया जमा हुआ उस से तीन मंजली ईमारत
बनायीं गयी .जिसमे दो बड़े हाल और साथ में 59
दुकानें भी थीं .इस भवन का नाम "जवाहर भवन
शोपिंग कोम्प्लेक्स "रखा गया. इस भवन
की भूमि पूजा तत्कालीन मुख्य मंत्री अर्जुन
सिंह ने 16 अगस्त 1984 को की थी.और
उद्घाटन राजीव गाँधी ने किया था. निर्माण हेतु
सदस्यों के चंदे से 29 .84 लाख और किराये से
66 .78 लाख जमा हुए थे. और कराए की राशी से
पार्टी का खर्च चलने की बात कही गयी थी.
बाद में दिग्विजय सिंह ने 19 /12 /85 को एक
फर्जी ट्रस्ट बनाकर उस भवन पर कब्ज़ा कर
लिया .यद्यपि उस ट्रस्ट का नाम "कांग्रेस
कमिटी ट्रस्ट "था लेकिन उसका कांग्रेस से
कोई सम्बन्ध नहीं था .दिग्विजय ने अनुभागीय
अधिकारी (तहसीलदार )के समक्ष शपथपत्र
देकर कहा की यह ट्रस्ट पुण्यार्थ है. और
जवाहर भवन की सारी चल अचल
सम्पति इसी ट्रस्ट की है .इस तरह कांग्रस
दिग्विजय की किरायेदार बन गई. देखिये
(देशबंधु दिनांक 6 दिसंबर 1998 )
दिग्विजय ने उस ट्रस्ट का खुद को अध्यक्ष
बना दिया .उक्त ट्रस्ट में निम्न पदाधिकारी थे.
1. अध्यक्ष -दिग्विजयसिंह पुत्र बलभद्र सिंह
2 .मोतीलाल वोरा ट्रस्टी
3 जगत पाल सिंह मेनेजिंग ट्रस्टी .
इस ट्रस्ट के विरुद्ध न्यायालय अनुभागीय
अधिकारी तहसील हुजुर भोपाल में एक जनहित
याचिका भी दर्ज कीगयी थी. जो प्रकरण
संख्या 04 बी -113 /85 -86 दिनांक 12 जुलाई
88 में दर्ज हुआ था. बाद में यह
मामला श्री आर .एम् .भटनागर ने विधान सभा में
भी उठवाया.म.प्र. विधान सभा के प्रश्न
संख्या 9 (क्रमांक 579 )दिनांक 23 फरवरी 96
को उक्त ट्रस्ट के बारे में श्री करण सिंह ने यह
सवाल किया था .क्या राज्यमंत्री धार्मिक
न्यास यह बताने का कष्ट करेंगे की इस ट्रस्ट
के पंजीयन के समय तक कितनी बार
ट्रस्टियों के नाम बदले गए हैं ?
जैसा की भटनागर ने 24 दिसंबर 98 को प्रश्न
किया था .और पंजीयक से शिकायत की थी ?
इस पर विधान सभा में राज्यमंत्री धार्मिक
न्यास श्री धनेन्द्र साहू ने उत्तर
दिया था कि अबतक उक्त ट्रस्ट के ट्रस्टी चार
बार बदले गए हैं और ट्रस्ट के भवन कि दुकाने
पट्टे पर नहीं बल्कि किराये पर दी गयीं है. और
इसकी अनुमति भी नहीं ली गयी थी .यही नहीं उक्त
ट्रस्ट कि औडिट रिपोर्ट भी 31 मार्च 2000
तक नहीं दी गयी है .
इसके बाद दिग्विजय सिंह ने दुकानों से प्राप्त
कराए क़ी पार्टी को न देकर अपने निजी काम में
लगाना सुरु कर दिया .जिसकी खबर इंदौर से
प्रकाशित "Free Press Journal "ने दिनांक 5
नवम्बर 1986 को इस हेडिंग से प्रकाशित
की थी."Digvijay accused of misusing
party funds "
श्री भटनागर ने बताया कि जवाहर भवन की 59
दुकानों से मिलाने वाले किराये से प्रति माह
दो तीन लाख रुपये कि जगह सिर्फ मुश्किल
65000 /- ही जमा होते थे .इस प्रकार अकेले 10
सालों में करोड़ों का घपला किया गया है. उक्त
ट्रस्ट का खाता पंजाब नॅशनल बैंक की भोपाल
टी .टी. नगर ब्रांच में थी .जिसका खता नुम्बर
19371 है. खाते से पता चला कि 1 अप्रेल 2001
से 26 मार्च 2003 तक ट्रस्ट से "एक
करोड़ ,इक्कीस लाख ,एक हजार छे सौ उनचास
"रुपये नकले गए थे. जिसमे सेल्फ के नाम से
162739 /- दिग्विजय ने निकला था .बैंक
का लोकर भी थी .जिसमे कई मूल्यवान वस्तुएं
भी थी जो भेंट में मिली थी .असके आलावा नकद
राशी भी थी .भटनागर ने बताया कि उस समय
खाते में ग्यारह करोड़ राशी थी .लोकर
कि दो चाभियाँ थी .एक जगतपाल सिह के
पास ,और दूसरी दिग्विजय के पास थी .जब
जगतपाल कि मौत होजाने के बाद लोकर
खोला गया तो उसकी कीमती चीजे गायब
थी .और खाते से 9 करोड़ रुपयों का कोई हिसाब
नहीं मिला,देखिये साप्ताहिक पत्र इंदौर से
प्रकाशित"स्पुतनिक "दिनांक 31
जनवरी 2005.
इसी पत्र में यह भी लिखा है कि दिग्विजय से
ट्रस्ट से सेल्फ के नाम से 65000 /-
निकाला था .और अपने मित्र राधा किशन
मालवीय को स्कोर्पियो खरीदने
को दिया था .बाद में उस गाड़ी को को शाजापुर में
दुर्घटना ग्रस्त बता दिया था. आज भी जवाहर
भवन दिग्विजय के कब्जे में है. श्री भटनागर ने
इसकी शिकायत सोनिया को 31 जनवरी 2005
लिखित में शपथ पूर्वक कर दी थी और मांग
कि थी कि दिग्विजय से कांग्रेस
की सम्पति वापस करवाई जाये और उसे
राजनीतिक सन्यास पर भेज दिया जाये.

Monday, February 18, 2013

सलमान खुर्शीद का इतिहास

सलमान खुर्शीद का इतिहास बहुत ही दागदार और घिनौना रहा है

मित्रो, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद भले ही बहुत धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलकर हिंदी बोलने वालो को नाली का कीड़ा कहता है लेकिन सच्चाई ये है की इसका भूतकाल बहुत ही घिनौना और दागदार रहा है |

१- इसकी बहन ने जब घर में कहा की वो एक हिन्दू से प्यार करती है औए उससे ही शादी करेगी तब इसने बहुत हंगामा मचाया था | जबकि इसने खुद एक ईसाई को मुस्लिम बनाकर निकाह किया है | इसने अपनी बहन पर उस हिन्दू को मुस्लिम बनाने का दबाव डाला ..इतना ही नही इसने उस लडके को भी मुस्लिम बनने के लिए सारे हथकंडे अपनाये | लेकिन अंत में इसकी बहन हिन्दूधर्म स्वीकार करके शादी की |

२- इसने प्रधानमन्त्री कार्यालय की वेबसाइट को जो अपनी सम्पत्ति का कीमत दिखाया है वो सरासर झूठ और फर्जी है | इसके गोवा के पोश विस्तार कोल्गुन्ता में दो फ़्लैट है | इसने अपने ११० वर्ग मीटर फ़्लैट की कीमत मात्र 4 लाख 29 हजार रुपया और १०२ वर्गमीटर फ़्लैट की कीमत मात्र 3 लाख 94 हजार रुपया बताया है |

जबकि गोवा के बाज़ार भाव से एक फ़्लैट की कीमत दो करोड़ से भी ज्यादा होनी चाहिए |
मजे की बात ये है की प्रधानमन्त्री से इससे कोई सवाल जबाब भी नही किया |

३- कई आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त मुस्लिम सन्गठन सिमी पर जब इसकी खुद की कांग्रेस सरकार ने प्रतिबन्ध लगाया तब ये अपनी ही सरकार के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चार सालो तक सिमी का वकील बनकर मुकदमा लड़ा | मजे की बात ये की इसने सिमी के एक रूपये फ़ीस तक नही ली जबकि ये भारत के सबसे महंगे वकीलों में से एक है |
ये सुप्रीमकोर्ट में दलीले देता था की सिमी तो एक सांस्कृतिक सन्गठन है और आतंकवाद से उसका कोई रिश्ता नही है ..फिर जब जज ने कहा की ये बात आपने अपनी खुद की सरकार जिसमे आप मंत्री है उसे क्यों नही बताये ?

इस बारे में जब कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के पूछा गया था तब उन्होंने कहा की एक वकील का सम्वैधानिक फर्ज है की वो कोई भी केस लड़े | लेकिन यही नीच तिवारी और नीच कांग्रेस जब जेठमलानी राजीव गाँधी के हत्यारे और इंदिरा के हत्यारे का केस लड़ते है तो उनके उपर सवाल उठाते है और उनके घर पर हमला भी करते है |

४- ये दावे के साथ कहता है की जब बाटला हॉउस एनकाउंटर में आतकंवादी मरे तो जैसे ही उनके मरने की खबर सोनिया गाँधी को मिली सोनिया गाँधी छाती पिट पिट कर दहाड़े मारकर रोने लगी | इसने खुद सोनिया की आँखों में आंसू देखा था |

५- ये इतना ज्यादा कट्टरवादी मुस्लिम है कि ये इस्लाम के नाम पर कुछ भी कर सकता है |
बटवारे के बाद जब इसकी खुद की कांग्रेस सरकार ने "एनेमिज प्रॉपर्टीज एक्ट" बनाया जिसमे जो लोग पाकिस्तान गये उनकी सम्पत्ति पर मालिकाना हक भारत सरकार का होगा | चूँकि भारत से सिर्फ मुस्लिम ही पाकिस्तान गये इसलिए इसने इसका विरोध किया | इतना ही नही इसने इसके खिलाफ महमूदाबाद के नबाब के तरफ से कई सालो तक सुप्रीम कोर्ट में अपनी ही कांग्रेस के भारत सरकार के खिलाफ केस लड़ा | जब ये देखा कि ये जीत नही सकता तब इसने अपनी सरकार पर दबाव डलवाकर गुपचुप तरीके से एनेमिज प्रोपर्टीज एक्ट में २०१० में बदलाव करवा दिया | जिससे ये राजा महमूदाबाद का केस जीत गया और फ़ीस के बदले में इसे कुल सम्पत्ति जो करीब चार हजार करोड़ रूपये कि है उसका १०% लिया |

६- २०१० के २जी घोटाले के समय ये कोर्पोरेट मामलो का मंत्री था | जब २ जी में रिलायन्स और एस्सार फंसने लगी तब इसने एक केबिनेट मंत्री होते हुए भी सीबीआई निदेशक को एक पत्र लिखा कि इन दोनों कम्पनियों ए खिलाफ आप कोई जाँच न करे क्योकि इन्होने कुछ भी गलत नही किया है |जाहिर सी बात है इसने सीबीआई को ये पत्र मुफ्त में नही लिखा होगा | इसके इस पत्र को जब प्रशांत भूषण ने आधार बनाकर सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर किया कि कुछ मंत्री इस महाघोटाले की जाँच को प्रभावित कर रहे है तब सुप्रीमकोर्ट के इसे एक कुत्ते की तरफ लतियाया था | इसने बाद में कोर्ट में
माफ़ी मांग ली |

७- इसके ट्रस्ट जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट ने जो जो घोटाले और पाप किये है वो आजकल सबके सामने आ रहे है |

अरविन्द केजरीवाल : एक मोहरा? जो कांग्रेस के लिए काम करता है

अरविन्द केजरीवाल : एक मोहरा? जो कांग्रेस के लिए काम करता है

जब किसी कम्पनी के सारे उत्पाद एक-एक करके मार्केट में फ़ेल होने लगते हैं और कम्पनी का मार्केट शेयर गिरने लगता है, तथा उसकी साख खराब होने लगती है, साथ ही जब उसकी प्रतिद्वंद्वी कम्पनी के मार्केट में छा जाने की संभावनाएं मजबूत होने लगती हैं, तब ऐसी स्थिति में वह कम्पनी क्या करती है? अक्सर ऐसी स्थिति में दो-तरफ़ा “मार्केटिंग और मैनेजमेण्ट की रणनीति” के तहत – 1) किसी तीसरी कम्पनी को अधिग्रहीत कर लिया जाता है, और नए नामों से प्रोडक्ट बाज़ार में उतार दिए जाते हैं और 2) इस नई कम्पनी के ज़रिए, यह बताने की कोशिश की जाती है कि, प्रतिद्वंद्वी कम्पनी के उत्पाद भी बेकार हैं।

एक प्रसिद्ध विचारक ने कहा है कि – “…If you could not CONVINCE them, CONFUSE them…” अर्थात “यदि तुम सामने वाले को सहमत नहीं कर पाते हो, तो उसे भ्रम में डाल दो…”। आप सोच रहे होंगे कि Arvind Kejriwal की तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम(?) का इस मार्केटिंग सिद्धांत से क्या सम्बन्ध है? यदि पिछले कुछ माह की घटनाओं और विभिन्न पात्रों के व्यवहार पर निगाह डालें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अरविन्द केजरीवाल, इसी “नई तीसरी कम्पनी” के रूप में उभरे हैं, जो कि वास्तव में कांग्रेस नामक कम्पनी का ही “बाय-प्रोडक्ट” है। इसे सिद्ध करने के लिए पहले हम घटनाक्रमों के साथ-साथ इतिहास पर भी आते हैं…
अधिक पीछे न जाते हुए हम सिर्फ़ दो “मोहरों” के इतिहास को देखेंगे… पहला है पंजाब में जरनैल सिंह भिंडराँवाले और दूसरा है महाराष्ट्र में राज ठाकरे (Raj Thakre)…। पाठकों को याद होगा कि जब पंजाब में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने अपने राजनैतिक अभियान के तहत कांग्रेस के खिलाफ़ अकाली दल को खड़ा किया, और उसकी लोकप्रियता रातोंरात बढ़ी, तब इन्दिरा गाँधी की नींद उड़ना शुरु हो गई थी। कांग्रेस ने (अर्थात इंदिरा गाँधी ने) पंजाब में जरनैल सिंह भिंडरांवाले को समर्थन और मदद देना शुरु किया, ताकि अकाली दल से मुकाबला किया जा सके। इस चाल में कामयाबी भी मिली और अकाली दल दो-फ़ाड़ हो गया, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में भी दरार पड़ गई और धीरे-धीरे भिंडरांवाले सर्वेसर्वा बनकर काबिज हो गए। भिंडराँवाले के कई कार्यों और सम्पर्कों की तरफ़ से जानबूझकर आँख मूंदे रखी गई, परन्तु इसकी आड़ में कांग्रेस को धता बताते हुए खालिस्तान आंदोलन मजबूत हो गया। हालांकि आगे चलकर कांग्रेस को इस “चालबाजी” और घटिया राजनीति का खामियाज़ा इन्दिरा गाँधी की जान देकर चुकाना पड़ा, परन्तु इस लेख का मकसद पंजाब की राजनीति में जाना नहीं है, बल्कि कांग्रेस द्वारा “मोहरे” खड़े करने की पुरानी राजनीति को बेनकाब करना है।
ठीक भिंडरांवाले की ही तरह महाराष्ट्र के मुम्बई में शिवसेना के दबदबे को तोड़ने के लिए राज ठाकरे की महत्त्वाकांक्षाओं को न सिर्फ़ हवा दी गई, बल्कि उसके कई कृत्यों (दुष्कृत्यों) की तरफ़ से आँख भी मूँदे रखी गई। राज ठाकरे ने कई बार महाराष्ट्र सरकार को चुनौती दी, बिहारियों के साथ सरेआम मारपीट भी की, लेकिन चूंकि राज ठाकरे के उत्थान में कांग्रेस अपना फ़ायदा देख रही थी, इसलिए उसे परवान चढ़ने दिया गया, ताकि वह शिवसेना के मुकाबले खड़ा हो सके और उनके आपसी वोट कटान से कांग्रेस को लाभ मिले…। इस चाल में भी कांग्रेस कामयाब रही, राज ठाकरे की गलतियों और कृत्यों पर परदा डालने के अलावा, मनसे को खड़ा करने के लिए लगने वाला “लॉजिस्टिक सपोर्ट” (आधारभूत सहायता) भी कांग्रेस ने मुहैया करवाई, जिसके बदले में महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में कम से कम 40 सीटों पर राज ठाकरे ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन को नुकसान पहुँचाया, आगे चलकर नगरीय निकाय चुनावों में भी राज ठाकरे ने विपक्ष को भारी नुकसान पहुँचाया… कांग्रेस यही तो चाहती थी। हालांकि इन दोनों किरदारों में जमीन-आसमान का अन्तर है और केजरीवाल के साथ इनकी तुलना शब्दशः अथवा सैद्धांतिक रूप से नहीं की जा सकती, परन्तु पहले दोनों उदाहरण कांग्रेस द्वारा मोहरे खड़े करके फ़ूट डालने के सफ़ल उदाहरण हैं।अब हम आते हैं केजरीवाल पर…
क्या कभी किसी ने ऐसा उदाहरण देखा है, कि सरेआम कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए कोई व्यक्ति बिजली के खंभे पर चढ़कर, जबरन किसी की काटी गई बिजली जोड़ दे। वहाँ खड़े होकर मुस्कुराते हुए फ़ोटो खिंचवाए, पत्रकारों को इंटरव्यू दे और आराम से निकल जाए… और इतना सब होने पर भी उस व्यक्ति के खिलाफ़ एक FIR तक दर्ज ना हो? आम परिस्थितियों में ऐसा नहीं हो सकता, लेकिन यदि उस व्यक्ति को परदे के पीछे से कांग्रेस का पूरा समर्थन हासिल हो तब जरूर हो सकता है। Arvind Kejriwal कहते हैं कि दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ना उनका पहला लक्ष्य है, जबकि वास्तव में यह लक्ष्य कांग्रेस का है, कि किसी भी तरह शीला दीक्षित को चौथी बार चुनाव जितवाया जाए, इसलिए यदि केजरीवाल को आगे करने, बढ़ावा देने और उसके खिलाफ़ कोई कड़ी कार्रवाई न करके, दिल्ली विधानसभा की 20-25 सीटों पर भी भाजपा को मिलने वाले वोटों की “काट” खड़ी की जा सके, तो यह कोई बुरा सौदा नहीं है। आँकड़े बताते हैं कि कांग्रेस और भाजपा को मिलने वाले वोटों का प्रतिशत लगभग समान ही होता है, परन्तु सिर्फ़ एक-दो प्रतिशत वोटों से कोई भी पार्टी हार सकती है। शीला दीक्षित हो या कांग्रेस के ढेरों मंत्री, किसी की “मार्केट इमेज” अच्छी नहीं है (बल्कि रसातल में जा चुकी है), ऐसे में यदि केजरीवाल नामक प्रोडक्ट को बाज़ार में स्थापित कर दिया जाए और मार्केट शेयर (यानी वोट प्रतिशत) का सिर्फ़ 2-3 प्रतिशत बँटवारा भी हो जाए, तो कांग्रेस की मदद ही होगी। अर्थात कांग्रेस या किसी अन्य तीसरी शक्ति के “बाय-प्रोडक्ट” अरविन्द केजरीवाल के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव एक प्रकार का “लिटमस टेस्ट” भी है और “टेस्टिंग उपकरण” भी है। यदि “ईमानदारी”(?) का ढोल पीटते हुए राजा हरिश्चन्द्रनुमा इमेज के जरिए कुछ बुद्धिजीवियों, कुछ आदर्शवादी युवाओं और कुछ भोले-भाले लोगों को “भ्रमित” (Confuse) कर लिया तो समझो मैदान मार लिया…। यदि दिल्ली विधानसभा में यह “प्रयोग” सफ़ल रहा तभी इसे 2014 के लोकसभा चुनावों में भी आजमाया जाएगा…

बहरहाल, बात हो रही थी केजरीवाल की…। वास्तव में दो साल पहले जब से अन्ना आंदोलन आरम्भ हुआ, तभी से यह देखा गया कि उस टीम के क्रियाकलापों में अरविन्द केजरीवाल की किसी से भी नहीं बनी। अक्सर केजरीवाल अपनी मनमानी चलाते रहे और उनके तानाशाही और “पूर्व-अफ़सरशाही” रवैये के कारण अन्ना हजारे, किरण बेदी, जस्टिस हेगड़े समेत एक-एक कर सभी साथी केजरीवाल से अलग होते गए। परन्तु चूंकि केजरीवाल उस “विशिष्ट जमात” से आते हैं जो NGOs के विशाल नेटवर्क के साथ-साथ सेकुलरों और वामपंथियों के जमावड़े से बना हुआ है, तो इन्हें नए-नए मित्र मिलते गए। परन्तु केजरीवाल के साथ दिक्कत यह हो गई, कि जिस “राजा हरिश्चन्द्र” की छवि के सहारे वे कांग्रेस और भाजपा को एक समान बताने अथवा दोनों पार्टियों को एक जैसा भ्रष्ट बताने की कोशिशों में लगे, उनके दागी साथियों के इतिहास और पूर्व-कृत्यों ने इस पर पानी फ़ेर दिया। इनके साथियों के इतिहास को भी हम बाद में संक्षिप्त में देखेंगे, पहले हम केजरीवाल द्वारा की गई “राजनैतिक” चालाकियों और किसी “तीसरी शक्ति” द्वारा संचालित होने वाले उनके “मोहरा-व्यवहार” पर प्रकाश डालेंगे…
जब केजरीवाल, अन्ना से अलग हुए और उन्होंने राजनैतिक पार्टी बनाने का फ़ैसला किया, उसी दिन से उन्होंने स्वयं को “इस ब्रह्माण्ड का एकमात्र ईमानदार व्यक्ति” बताने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। केजरीवाल के इस तथाकथित आंदोलन के लॉंच होने से पहले देश में दो बड़े-बड़े घोटालों पर चर्चा, बहस और विच्छेदन चल रहे थे, वह थे 2G घोटाला और कोयला घोटाला तथा थोरियम घोटाले की खबरें भी छन-छनकर मीडिया में आना शुरु हो चुकी थीं। लेकिन केजरीवाल ने अपनी आक्रामक छापामार मार्केटिंग तकनीक तथा चैनलों के TRP प्रेम को अपना “हथियार” बनाया। जिस तरह “कौन बनेगा करोड़पति” के अगले एपीसोड का प्रचार किया जाता है, उसी तरह केजरीवाल भी अपने साप्ताहिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में “आज का खुलासा – आज का खुलासा” टाइप का प्रचार करने लगे।
केजरीवाल ने अपनी मुहिम की पहली बड़ी शुरुआत की, दिल्ली में बिजली दरों के खिलाफ़ आंदोलन करके। उन्होंनें एक दो जगह जाकर कटी हुई बिजली जोड़ने का नाटक किया, मुस्कुराए, फ़ोटो खिंचाए और चल दिए। लेकिन केजरीवाल यह नहीं बता पाए कि जब दिल्ली की जामा मस्जिद पर चार करोड़ से अधिक का बिजली बिल बकाया है तो उसके खिलाफ़ उन्होंने एक शब्द भी क्यों नहीं कहा? कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा-संघ-भगवा से नफ़रत करने के क्रम में जब पिछले अप्रैल में वे बुखारी को मनाने उनके घर पहुँचे थे, तब इनके बीच कोई साँठगाँठ पनप गई? खैर… केजरीवाल का अगला हमला(?) हुआ सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर तथा DLF के आर्थिक कनेक्शनों की संदिग्धता दर्शाने और पोल खोलने से। रॉबर्ट वाड्रा पर उन्होंने “सिर्फ़ 300 करोड़” के घोटाले का आरोप मढ़ा, और यह सिद्ध करने की कोशिश की, कि हरियाणा सरकार, रॉबर्ट वाड्रा, DLF और कांग्रेस सबने आपसी मिलीभगत से दिल्ली-राजस्थान-हरियाणा में जमकर जमीनों की लूट की है, जिससे रॉबर्ट वाड्रा को रातोंरात करोड़ों रुपए का लाभ हुआ है। एक शानदार सनसनी फ़ैलाने के लिए तो केजरीवाल द्वारा रॉबर्ट वाड्रा का नाम लेना बहुत मुफ़ीद साबित हुआ, और मीडिया ने इस हाथोंहाथ लिया… एक सप्ताह तक इस घोटाले पर मगजपच्ची होती रही, चैनलों के डिबेट-रूम गर्मागर्म बहस से सराबोर होते रहे। तत्काल अगले सप्ताह, “बिग-बॉस” (सॉरी… केजरीवाल बॉस) का नया संस्करण मार्केट में आ गया, जिसमें उन्होंने सलमान खुर्शीद पर उनके ट्रस्ट द्वारा विकलांगों के लिए खरीदे जाने वाले उपकरणों में “71 लाख का महाघोटाला”(?), चैनलों पर परोस दिया। अगले दस दिन भी सलमान खुर्शीद की नाटकीय घोषणाओं, केजरीवाल की चुनौतियों, फ़िर सलमान खुर्शीद की “प्रत्युत्तर प्रेस-कॉन्फ़्रेंस” में बीत गया। एपिसोड के इस भाग में, “उत्तेजना”, “देख लूंगा”, “स्याही और खून”, टाइप के अति-नाटकीय ड्रामे पेश किए गए। अर्थात 1 लाख 76 हजार करोड़ के कोयला घोटाले से सारा फ़ोकस पहले 300 करोड़ के घोटाले और फ़िर 71 लाख के घोटाले तक लाकर सीमित कर दिया गया।
यहाँ पर मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि रॉबर्ट वाड्रा या सलमान खुर्शीद ने घोटाला या भ्रष्टाचार किया या नहीं किया, सवाल यह है कि इस प्रकार के “मीडिया-ट्रायल” और TRP अंक बटोरू मार्केटिंग नीति से केजरीवाल ने, मुख्य मुद्दों से देश का ध्यान भटका दिया। सुशील शिंदे पहले ही कह चुके हैं कि जब जनता बोफ़ोर्स भूल गई तो बाकी के घोटाले भी भूल जाएगी, तब उनका विश्वास केजरीवाल ड्रामे पर ही था। जैसा कि बेनीप्रसाद वर्मा ने मजाक में कहा कि “सिर्फ़ 71 लाख” से क्या होता है? कोई केन्द्रीय मंत्री “इतने कम”(?) का घोटाला कर ही नहीं सकता, उसी प्रकार रियलिटी सौदों से जुड़ा हुआ कोई मामूली व्यक्ति भी मजाक-मजाक में ही बता सकता है कि वास्तव में रॉबर्ट वाड्रा भी 300 करोड़ जैसा “टुच्चा घोटाला” कर ही नहीं सकते, क्योंकि महानगर में रियलिटी क्षेत्र में बिजनेस करने वाला मझोला बिल्डर भी 300 करोड़ से ऊपर का ही आसामी होता है, फ़िर रॉबर्ट तो ठहरे “राष्ट्रीय दामाद”, विभिन्न अपुष्ट सूत्रों के अनुसार वाड्रा कम से कम 5 से 8 हजार करोड़ के मालिक हैं, लेकिन सिर्फ़ चैनलों पर एक सप्ताह की बहस हुई, चर्चा हुई, कांग्रेस ने कहा कि हम वाड्रा के खिलाफ़ जाँच नहीं करवाएंगे… और मामला खत्म, अगला मामला (यानी सलमान दबंग का) शुरु…।

इन दोनों मुद्दों पर मिली हुई TRP, प्रसिद्धि, कैमरों-माइक की चमक-दमक और VIP दर्जे ने अरविन्द केजरीवाल को एक गुब्बारे की तरह हवा में चढ़ा दिया। आम जनता के बीच चैनलों ने उनकी “राजा हरिश्चन्द्र” जैसी पहले से पेश की हुई छवि को, पॉलिश करके और चमकाना आरम्भ किया। इन शुरुआती हमलों के बाद चूंकि उन्हें भाजपा-कांग्रेस को एक समान दर्शाना था, इसलिए जल्दबाजी में उन्होंने नितिन गडकरी पर हमला बोल दिया। दस्तावेजों के अभाव, मुद्दों की अधूरी समझ तथा गडकरी को भ्रष्ट साबित करने की इस जल्दबाजी ने इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस को “फ़्लॉप शो” बनाकर रख दिया। यहाँ तक कि भाजपा के विरोधियों को भी केजरीवाल द्वारा गडकरी के खिलाफ़ पेश किए गए “तथाकथित सबूतों” में भ्रष्टाचार कहाँ हुआ है, यह ढूँढ़ने में खासी मशक्कत करनी पड़ी। परन्तु अव्वल तो केजरीवाल जल्दबाजी में हैं और दूसरे उनका किसी संस्था पर भरोसा भी नहीं है, इसलिए न तो केजरीवाल ने रॉबर्ट वाड्रा, न ही सलमान खुर्शीद और न ही नितिन गडकरी* पर कोई FIR दर्ज करवाई, न कोई मुकदमा दायर किया और न ही सरकार से इन सबूतों(?) की किसी प्रकार की जाँच करने की माँग की। क्योंकि केजरीवाल का मकसद था, “सिर्फ़ हंगामा” खड़ा करके सस्ती लोकप्रियता बटोरना, और अपने “गुप्त” आकाओं के इशारे पर कांग्रेस-भाजपा को एक ही कठघरे में खड़ा करना। यहाँ पर भी चालबाजी यह कि जहाँ एक ओर गडकरी तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, वहीं दूसरी ओर रॉबर्ट वाड्रा तो कांग्रेस के सदस्य भी नहीं हैं… क्या केजरीवाल में सोनिया गाँधी के इलाज पर होने वाले खर्च, वायुसेना के विमानों की सवारी के बारे में सवाल पूछने की हिम्मत है? साफ़ बात है कि गडकरी पर हमला बोलकर उन्होंने अपना “छिपा हुआ मकसद” हासिल करने की नाकाम कोशिश की, जबकि राहुल गाँधी या अहमद पटेल को छुआ तक नहीं। ज्ञातव्य है कि प्रियंका गाँधी भी रॉबर्ट की कई कम्पनियों में हाल के दिनों तक एक निदेशक थीं।
बहरहाल, नितिन गडकरी के खिलाफ़ पेश किए गए “बोदे और बकवास किस्म के सबूतों” के तत्काल बाद जब भाजपा समर्थकों ने केजरीवाल के “अनन्य सहयोगियों”(?) के खिलाफ़ मोर्चा खोला और कई तथ्य पेश किए तब से केजरीवाल साहब बैकफ़ुट पर आ गए हैं। असल में केजरीवाल द्वारा गढ़ी गई “राजा हरिश्चन्द्र” की छवि को भुनाने के लिए अंजलि दमानिया और मयंक गाँधी जैसे लोग भी केजरीवाल के साथ जुड़ गए। गडकरी पर आरोप लगाने से पहले अंजली दमानिया को कोई नहीं जानता था, लेकिन जब खोजबीन की गई तो पाया गया कि यह मोहतरमा खुद ही जमीन के विवादास्पद सौदों में शामिल हैं। दमानिया ने कर्जत (मुम्बई) में आदिवासियों की जमीन झूठ बोलकर खरीदी और जब वहाँ बनने वाले बाँध की डूब में आने लगी तो उनकी जमीन के बदले दूसरे आदिवासियों की जमीन ली जाए ऐसा पत्र भी महाराष्ट्र सरकार को लिखा। जब इस अवैध जमीन पर कालोनी बसाने की योजना खटाई में पड़ गई तो मोहतरमा ने चारों ओर हाथ-पैर मारे, लेकिन जमीन नहीं बची… इसकी खुन्नस अंजली दमानिया ने नितिन गडकरी पर उतार दी। अरविन्द की टीम में ऐसे ही दूसरे संदिग्ध व्यक्ति हैं मयंक गाँधी, मुम्बई में इनके बारे में कई सच्चे-झूठे किस्से मशहूर हैं तथा “लोकग्रुप” के नाम से जो हाउसिंग सोसायटी है उसकी कई अनियमितताओं के पुलिंदे महाराष्ट्र सरकार के पास मौजूद हैं, साथ ही इन महोदय पर दूसरे बिल्डरों एवं जमीन मालिकों को कथित रूप से धमकाने के आरोप भी हैं। टीम के तीसरे प्रमुख सदस्य प्रशांत भूषण तो खैर शुरु से ही विवादों में हैं, चाहे वह कश्मीर की स्वायत्तता सम्बन्धी बयान हो, उत्तरप्रदेश में झूठी कीमत बताकर, सस्ती रजिस्ट्री करवाना हो, या हिमाचल प्रदेश में जमीन खरीदने का मामला हो… यह साहब भी “कथित हरिश्चन्द्र टीम” में शामिल होने लायक नहीं हैं…। अब बचे स्वयं श्री अरविन्द केजरीवाल, जिन पर फ़ोर्ड फ़ाउण्डेशन सहित अमेरिका के अन्य संगठनों से लाखों डॉलर चन्दा लेने का आरोप तो है ही, “इंडिया अगेन्स्ट करप्शन” के बैनर तले अन्ना आंदोलन के समय लिए गए पैसों के दुरुपयोग और उनके खुद के NGO, PCRF के लाभ के लिए उपयोग करने के आरोप भी हैं (हालांकि जब इसकी पोल खुल गई थी, तब वे चन्दे में एकत्रित हुए 2 करोड़ रुपए लेकर अन्ना को भेंट करने उनके गाँव पहुँच गए थे)। इन्हीं की टीम के एक पूर्व सदस्य वायपी सिंह ने केजरीवाल पर खुलेआम शरद पवार को बचाने का आरोप लगा डाला, और केजरीवाल सिर्फ़ खिसियाकर रह गए। इनकी वेबसाईट पर जब IAC का हिसाब-किताब देखा जाता है तब उसमें लाखों रुपए का खर्च “वेतन-भत्ते” के मद में डाला गया है, चकरा गए ना!!! जी हाँ, संभवतः वेतन-भत्ते लेकर किया जाने वाला यह अपने-आप में पहला ही “ई-आंदोलन” होगा।
जो कांग्रेस सरकार कानूनन अनुमति लेकर आमसभा और योग करने आए निहत्थे लोगों को रामलीला मैदान से क्रूरतापूर्ण पद्धति अपनाकर आधी रात को मार-मारकर भगा देती है, वही सरकार केजरीवाल को बड़े आराम से बिजली के तार जोड़ने और मुस्कराते हुए फ़ोटो खिंचाने की अनुमति दे देती है। जो सरकार बाबा रामदेव के खिलाफ़ अचानक सैकड़ों मामले दर्ज करवा देती है, वही सरकार केजरीवाल के NGO के खिलाफ़ एक सबूत भी नहीं ढूँढ पाती? जब किसी की गाड़ी चौराहे पर ट्रैफ़िक पुलिस द्वारा पकड़ी जाती है, तब सारे कागज़ात होते हुए भी वह इंस्पेक्टर ऐसा कोई न कोई पेंच उस गाड़ी में निकाल ही देता है कि चालान बन ही जाए, परन्तु जो सरकार हाथ-पाँव धोकर फ़िलहाल बाबा रामदेव के पीछे पड़ी है, उसे अरविन्द केजरीवाल के NGOs के खिलाफ़ एक भी सबूत नहीं मिला? यह कोई हैरत की बात नहीं “अंदरूनी मोहरावादी वोट गणित समझने” की बात है…

कुल मिलाकर, कहने का तात्पर्य यह है कि अरविन्द केजरीवाल सिर्फ़ TRP वाली नौटंकियाँ करने में माहिर हैं, भ्रष्टाचार से लड़ाई करने का न तो उनका कोई इरादा है और न ही इच्छाशक्ति। केजरीवाल को सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए खड़ा किया गया है ताकि कांग्रेस के घोटालों से ध्यान भटकाया जा सके, भाजपा को भी कांग्रेस के ही समकक्ष खड़ा करते हुए, मतदाताओं में भ्रम पैदा किया जा सके, और इस भ्रम के कारण होने वाले 2-3 प्रतिशत वोटों के इधर-उधर होने पर इसका राजनैतिक फ़ायदा उठाया जा सके। टीवी चैनलों के लिए केजरीवाल एक रियलिटी टीवी शो की तरह हैं, गुजरात चुनाव और आगामी लोकसभा चुनाव से पहले ऐसे कई रियलिटी शो आने वाले हैं। न्यूज़ चैनलों को मुफ्त में काम करने वाला एक “गढ़ा गया हीरो” टाइप का नेता मिल गया है। यह ऐसा नेता है जो आमिर खान की तरह ही शो करेगा, कभी कभी जनता में लेकिन अधिकांशतः टीवी स्टूडियो या प्रेस कॉफ्रेस में ही मिलेगा।
अब अंत में सिर्फ़ एक ही सवाल पर विचार करेंगे तो समझ जाएंगे कि भ्रष्टाचार के मूल मुद्दों को पीछे धकेलने और भाजपा की बढ़त को रोकने के लिए मीडिया और कांग्रेस किस तरह से हाथ में हाथ मिलाकर चल रहे हैं… सवाल है कि पिछले कई सप्ताह से उमा भारती गंगा के प्रदूषण और गंगा नदी को बचाने के लिए एक विशाल यात्रा कर रही हैं, जो बिहार-उत्तरप्रदेश में गंगा किनारे के जिलों में चल रही है… कितने पाठक हैं जिन्होंने उमा भारती की इस यात्रा और गंगा से जुड़े मुद्दों पर मुख्य मीडिया में बड़ा भारी कवरेज देखा हो? केजरीवाल को मिलने वाले कवरेज और उमा भारती को मिलने वाले कवरेज, केजरीवाल और उमा भारती की ईमानदारी, तथा केजरीवाल और उमा भारती की संगठन क्षमता की तुलना कर लीजिए, आपके समक्ष “चित्र” स्पष्ट हो जाएगा कि वास्तव में केजरीवाल क्या “पहुँची हुई चीज़” हैं। यदि आप राजनैतिक गणित का आकलन करने के इच्छुक हैं तब तो आपके लिए यह आसान सा सवाल होगा कि, केजरीवाल की इस कथित मुहिम का लाभ किसे मिलेगा? यदि केजरीवाल को कुछ सीटें मिल जाती हैं तो किसका फ़ायदा होगा? क्या अन्ना के मंच से “भारत माता का चित्र हटवाने वाले” केजरीवाल कभी भाजपा के साथ आ सकते हैं? जब हमारा देश गठबंधन सरकारों के दौर में हैं तब केजरीवाल द्वारा 2-3 प्रतिशत वोटों को प्रभावित करने से क्या कांग्रेस के तीसरी बार सत्ता में आने का रास्ता साफ़ नहीं होगा??? अर्थात क्या आप अगले पाँच साल “UPA-3” को झेलने के लिए तैयार हैं? यदि नहीं… तो “मोहरों” से सावधान रहिए…

कांग्रेस ने हटा दिए ये कानून. क्यों ???

आप लोगो की इन सभी मुद्दों पर क्या राय है ???
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१. POTA : यह कानून काफी सख्त कानून था आतंकवाद के खिलाफ .. यह कानून कांग्रेस ने सत्ता में आते ही हटा दिया था. आप लोगो की क्या राय है ??

२. Fertility Control act : यह कानून का असली मकसद देश की जनसँख्या को नियंत्रित करना होगा .. इस कानून के तहत एक परिवार के सिर्फ और सिर्फ २ बच्चे हो सकते है | अगर किसी भी परिवार में दो से ज्यादा बच्चे होते है तोह उसको किसी भी तरह की सरकारी मदद नहीं मिलेगी , न कोई सरकारी नौकरी | यह कानून इसीलिए जरुरी है क्यूंकि आज देश में संसाधन बहुत तेजी से इस्तेमाल हो रहे है और बदती जनसँख्या के कारण महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी भी बड रही है..

३. Border Security : इस कानून के तहत भारत की पूरी सीमा ८ मीटर ऊँची और १ मीटर मोटी दीवार से सील कर दी जाएगी.. पूरी सीमा पर भारत के जवान होंगे , अगर कोई भी घुसपैठिया भारत की सीमा में घुसता दिखाई दे तोह सीधा गोली मारने का अधिकार होगा भारत के सैनिको केपास यह कानून इसीलिए जरुरी है क्यूंकि आज भारत की सीमा पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है इसी कारण पडोसी देशो जैसे की बांग्लादेश और नेपाल के रस्ते पाकिस्तानी हमारे देश में घुस जाते है और आतंकवाद मचाते है .. वहीँ दूसरी ओर भारत के संसाधनों का उपयोग करके भारत को ही बर्बाद करते है , भारत का आम नागरिक संसाधनों की कमी से भी झुजता है..

४. Universal Civil Code : इस कानून के तहत भारत का हर व्यक्ति समान होगा .. सबके लिए कानून एक होगा .. ना कोई हिन्दू होगा और ना ही कोई मुस्लिम होगा .. आज भारत में ऐसा कोई भी कानून नहीं है ! भारतीय जनता पार्टी इस बिल को लायी थी ..

हेलीकॉप्टरों के सौदे में अहम रोल

हेलीकॉप्टरों के सौदे में अहम रोल अदा करने वाले सभी प्यादों को आज सोनिया ने उपकृत किया है ..

१- प्रणव मुखर्जी --- सौदे के समय रक्षामंत्री थे आज राष्ट्रपति है

२-एम के नारायणन -- सौदे के समय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे - रिटायर होने के बाद सोनिया ने इन्हें बंगाल का राज्यपाल बनाकर इनका ईनाम दे दिया

३-शेखर दत्त -- सौदे के समय रक्षा सचिव थे .. रिटायर होते ही सोनिया ने इन्हें छत्तीसगढ़ का राज्यपाल बनाकर इनका ईनाम दिया

४- बीवी वंचू -- सौदे के समय एसपीजी प्रमुख थे .. इन्हें सोनिया ने आज गोवा का राज्यपाल बनाकर इनका ईनाम दिया

मित्रो, ये चारो लोगो की कमेटी ने ही इस पुरे डील में अहमभूमिका निभाई है .. भारत में हर महीने सैकड़ो नौकरशाह रिटायर होते है लेकिन किसी को राज्यपाल जैसा भारीभरकम मलाईदार और कामचोर तथा मुफ्तखोर पद नही दिया जाता लेकिन इनलोगों को क्यों दिया गया ?

असल में इस डील में कुछ लोगो ने पैसा खाया तो कुछ लोगो को भारीभरकम पद देकर नवाजा गया

Sunday, February 17, 2013

कांग्रेस की सच्चाई

जब भी किसी के सामने कांग्रेस के बारे में बताता हु तो वो सबसे पहले यही बोलता है की कांग्रेस ने ही देश को आजाद करवाया था। गाँधी परिवार ने भारत के लिए बहुत कुर्बानियां दी है। आखिर कब तक सोएगी देश की भोली भाली जनता। इन्तहा हो गई अब तो जग जाओ।
आइयें म आपको बताता हु कांग्रेस की सच्चाई जिस पार्टी का गठन एक अंग्रेज ने किया हो और वो भी अपने ही देश के खिलाप वो भारत की क्या भलाई सोचेगा। उसने तो कांग्रेस का गठन ही इस लिए किया था ताकि देश के कुछ कमजोर नेताओं को शामिल करके भारत को जायदा दिन तक गुलाम रखे। इस काम में वो पूरी तरह सफल भी रहा। उसी का नतीजा आज पूरा देश भुगत रहा है और तब तक भुगतेगा जब तक कांग्रेस को खत्म नही किया जायेगा। कांग्रेस ने अपने गठन से ले के देश की आजादी तक एक ही काम किया है देश भक्त क्रांतिकारियों और अंग्रेजों के बिच की कड़ी के रूप में। जब भी कोई आन्दोलन देश के आजादी की तरफ बढ़ता था कांग्रेस गाँधी का इस्तेमाल करके उसे ख़तम करवा देती थी। देश की आजादी तक गाँधी ने यही सब किया उसके बाद नेहरु ने भारत के कभी भी कांग्रेस के चंगुल से नही निकलने दिया। 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद गाँधी ने कहा था की कांग्रेस का काम देश को आजाद करवाना था भारत अब आजाद है तो कांग्रेस को खत्म कर देना चाहिए। नेहरु ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए पहले तो भारत माँ के दो टुकड़े करवा दिए उसके बाद गाँधी की बात को ना मानकर भारत के उपर कांग्रेस को थोप दिया।

जवाहर लाल नेहरु ने या इंदिरा गाँधी ने अपने जीवन में देश के लिए या देश के विकास के लिए कुछ नही किया। अगर किया होता देश की ये हालत न होती। 1945 के अमेरिकी हमले में जापान बर्बाद हो गया था उसके दो साल बाद1947 में भारत आजाद हुआ उसके दो साल बाद 1949 में चाइना आजाद हुआ था। ऐशिया के इन तीनो देशो का जन्म जैसे एक ही साथ हुआ था। पर आज हमारा पडोसी देश चाइना (हमसे जयादा आबादी का बोझ लेकर भी) और एक छोटा सा देश जापान हमसे 50 साल आगे निकल गए। हम अभी तक वही के वही खड़े है जहा से सबने एक साथ चलना शुरु किया था। हमारे देश को आजाद हुए 65 साल हो गए। इन 65 सालो में देश की सत्ता लगभग 57 सालो तक कांग्रेस के पास रही। पर आज भी देश का नागरिक भूख से मरता है, उनके पास रहने को घर नही है पीने को पानी नही है। लोग बिना इलाज के मर जाते है किसान अपना कर्ज नही चूका पाता इस लिए उसे आत्महत्या करनी पड़ती है। गरीब परिवार का बच्चा बिना शिक्षा के मजदूरी करने को मजबूर है। इतना सब होने के बाद भी क्या कोई कहेगा की कांग्रेस ने या गाँधी/नेहरु परिवार ने देश के लिए देश के नागरिकों के लिए कुछ किया है।

अब हमारे उपर एक और प्रधानमंत्री को थोपने की कोशिश की जा रही है जिसके पास एक छोटे बच्चे तक का दिमाग नही है जिसे ये भी नही पता की तुझे कहा पे क्या बोलना है और क्या नही बोलना। मुझे तरस आता है उन बेचारों की सोच पे जो कहते है की राहुल गाँधी तो देश पीम होना चाहिए ये बहुत स्मार्ट है। बहुत दिनों तक देश के लोगो ने एक नाटक भी देखा अपने इस कथित युवराज का जिसमे वो गरीबों की झोपडी में रुकता था और उनके साथ ही खाना भी खाता था। इस नाटक को देश की मीडिया ने भी बहुत अच्छे से हमें दिखाया पर किसी ने भी इस नाटक के पीछे का सच नही दिखाया। विदर्भ की जिस महिला के घर पे राहुल ने खाना खाया था और देश की मीडिया ने तब बहुत जोर शोर से इसे दिखाया था। उसकी गरीब महिला कलावती की लड़की सविता ने जब आत्महत्या की तब न तो राहुल का पता चला वो कहाँ है और न ही मीडिया ने इसे दिखाया। गरीब के घर रोटी खाई ये तो पुरे देश ने देखा पर जब एक इंसान गरीबी से तंग आके मर गया उसे किसी ने नही देखा।

सोनिया गाँधी की कहानी सुब्रमण्यम स्वामी की जुबानी

सोनिया गाँधी ही है भ्रष्‍ट नेताओं की सरदारिन

प्रस्‍तुति- डॉ0 संतोष राय

पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के सामने जब सोनिया गांधी ने सरकार बनाने का दावा पेश किया , तो वो पशोपेश में थे। ये 17 मई 2004 का दिन था। तब इस मामले में कई संवैधानिक अड़चनें थीं और कलाम इस पर सलाह लेना चाहते थे। मीडिया के तमाम हाइप के बावजूद वो तब सौ करोड़ लोगों के इस देश की प्रधानमंत्री नहीं बन पाईं। मैं यही कहूंगा कि ये संयोग था कि हमारी राष्ट्रीयता की अस्मिता की तब रक्षा हुई और इस पर खरोच लगने से बच गई। इसके बाद ये आवाजें भी उठीं कि भला किस तरह लोकतांत्रिक तरीके से और संवैधानिक तरीके से सोनिया गांधी को किसी सार्वजनिक पद से दूर रखा जा सकता है। मेरा सोनिया गांधी से विरोध केवल इसलिए नहीं है कि वो इतालवी हैं और इटली में पैदा हुई हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश में , जिसमें इटली भी शामिल है इस तरह का मुद्दा उठ ही पाता कि किसी विदेशी मूल के व्यक्ति को किस तरह देश का प्रमुख होने से रोका जाये , क्योंकि वहां संविधान में पहले से ही इस बात की साफ-साफ व्यवस्था की जा चुकी है। उनके कानून में साफ लिखा है कि जो व्यक्ति यहां पैदा हुआ होगा वही यहां का प्रमुख बन सकता है। भारत में इस तरह का कोई कानून नहीं है लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार राष्ट्रपति ने भारतीय सिटिजनशिप एक्ट (1855) के सेक्शन पांच के तहत काम किया। किसी विदेशी का भारतीय नागरिक के तौर पर रजिस्ट्रेशन करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय को भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए वही स्थिति अपनानी चाहिए थी जो कि इटली में होती है। ऐसे में श्रीमती गांधी पर भी वह नियम लागू होना चाहिए था जो कि किसी भारतीय के इटली में नागरिकता हासिल करने के लिए होता है। राष्ट्रपति ने 17 मई 2004 की दोपहर श्रीमती गांधी को सूचित किया अगर वह खुद अपनी सरकार बनाने पर जोर देंगी तो वह पहले एक बात को स्पष्ट करना चाहेंगे , जो सुप्रीम कोर्ट के रिफरेंस में होगा कि उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर विदेशी मूल के मामले पर चुनौती तो नहीं दी जा सकती है। राष्ट्रपति की ये रिपोर्ट एकदम सही थी। मैने इस संबंध में दो दिन पहले ही यानि 15 मई 2004 को एक याचिका दायर कर रखी थी कि सोनिया गांधी की नागरिकता कंडीशनल है और इस सूरत में वह प्रधानमंत्री नहीं बन सकतीं। राष्ट्रपति ने मुझे 17 मई 2004 की दोपहर मिलने के लिए बुलाया। उसमें मुझसे राय मांगी गई। मैंने उनसे कहा कि मैं सुप्रीम कोर्ट में इस असंवैधानिक नियुक्ति का विरोध करूंगा , जैसा कि मैंने 2001 में भी किया था , जब जयललिता को तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी। खैर हम अब सोनिया गांधी की ओर लौटते हैं और पहले ये जानते हैं कि सोनिया गांधी कौन हैं , उनसे , उनके परिवार और इटली के मित्रों से क्या खतरे हैं। बहुत कम लोग उनके अतीत के बारे में जानते हैं। उनका असली नाम एडविग एंतोनिययो अल्बिना मैनो है। और जानेंगे उन झूठ बातों के बारे में जो सोनिया से जुड़ी हैं। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि भारतीय लोग सोनिया के बारे में कुछ नहीं जानते और वो किन लोगों से ताल्लुक रखती हैं। यहां तक भारत में पैदा हुए नागरिक के बारे में भी कई बार हमें उसकी सही सही पृष्ठभूमि के बारे में मालूम नहीं हो पाता तो ऐसे में एक विदेशी के बारे में जानना जो बहुत छोटी सी जगह से ताल्लुक रखता हो , वाकई बहुत मुश्किल है।
तीन झूठ:
कांग्रेस पार्टी और खुद सोनिया गांधी अपनी पृष्ठभूमि के बारे में जो बताते हैं , वो तीन झूठों पर टिका हुआ है। पहला ये है कि उनका असली नाम अंतोनिया है न की सोनिया। ये बात इटली के राजदूत ने नई दिल्ली में 27 अप्रैल 1973 को लिखे अपने एक पत्र में जाहिर की थी। ये पत्र उन्होंने गृह मंत्रालय को लिखा था , जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। सोनिया का असली नाम अंतोनिया ही है , जो उनके जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार एकदम सही है। सोनिया ने इसी तरह अपने पिता का नाम स्टेफनो मैनो बताया था। वो दूसरे वल्र्ड वार के समय रूस में युद्ध बंदी थे। स्टेफनो नाजी आर्मी के वालिंटियर सदस्य थे। बहुत ढेर सारे इतालवी फासिस्टों ने ऐसा ही किया था। सोनिया दरअसल इतालवी नहीं बल्कि रूसी नाम है। सोनिया के पिता रूसी जेलों में दो साल बिताने के बाद रूस समर्थक हो गये थे। अमेरिकी सेनाओं ने इटली में सभी फासिस्टों की संपत्ति को तहस-नहस कर दिया था। सोनिया ओरबासानो में पैदा नहीं हुईं , जैसा की उनके बायोडाटा में दावा किया गया है। इस बायोडाटा को उन्होंने संसद में सासंद बनने के समय पर पेश किया था , सही बात ये है कि उनका जन्म लुसियाना में हुआ। शायद वह इस जगह को इसलिए छिपाने की कोशिश करती हैं ताकि उनके पिता के नाजी और मुसोलिनी संपर्कों का पता नहीं चल पाये और साथ ही ये भी उनके परिवार के संपर्क इटली के भूमिगत हो चुके नाजी फासिस्टों से युद्ध समाप्त होने तक बने रहे। लुसियाना नाजी फासिस्ट नेटवर्क का मुख्यालय था , ये इटली-स्विस सीमा पर था। इस मायनेहीन झूठ का और कोई मतलब नहीं हो सकता। तीसरा सोनिया गांधी ने हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई कभी की ही नहीं , लेकिन रायबरेली से चुनाव लड़ने के दौरान उन्होंने अपने चुनाव नामांकन पत्र में उन्होंने ये झूठा हलफनामा दायर किया कि वो अंग्रेजी में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से डिप्लोमाधारी हैं। ये हलफनामा उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान रायबरेली में रिटर्निंग ऑफिसर के सम्मुख पेश किया था। इससे पहले 1989 में लोकसभा में अपने बायोग्राफिकल में भी उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ यही बात लोकसभा के सचिवालय के सम्मुख भी पेश की थी , जो की गलत दावा था। बाद में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में उन्होंने इसे मानते हुए इसे टाइपिंग की गलती बताया। सही बात ये है कि श्रीमती सोनिया गांधी ने कभी किसी कालेज में पढाई की ही नहीं। वह पढ़ाई के लिए गिवानो के कैथोलिक नन्स द्वारा संचालित स्कूल मारिया आसीलेट्रिस गईं , जो उनके कस्बे ओरबासानों से 15 किलोमीटर दूर था। उन दिनों गरीबी के चलते इटली की लड़कियां इन मिशनरीज में जाती थीं और फिर किशोरवय में ब्रिटेन ताकि वहां वो कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें। मैनो उन दिनों गरीब थे। सोनिया के पिता और माता की हैसियत बेहद मामूली थी और अब वो दो बिलियन पाउंड की अथाह संपत्ति के मालिक हैं। इस तरह सोनिया ने लोकसभा और हलफनामे के जरिए गलत जानकारी देकर आपराधिक काम किया है , जिसके तहत न केवल उन पर अपराध का मुकदमा चलाया जा सकता है बल्कि वो सांसद की सदस्यता से भी वंचित की जा सकती हैं। ये सुप्रीम कोर्ट की उस फैसले की भावना का भी उल्लंघन है कि सभी उम्मीदवारों को हलफनामे के जरिए अपनी सही पढ़ाई-लिखाई से संबंधित योग्यता को पेश करना जरूरी है। इस तरह ये सोनिया गांधी के तीन झूठ हैं , जो उन्होंने छिपाने की कोशिश की। कहीं ऐसा तो नहीं कि कतिपय कारणों से भारतीयों को बेवकूफ बनाने के लिए उन्होंने ये सब किया। इन सबके पीछे उनके उद्देश्य कुछ अलग थे। अब हमें उनके बारे में और कुछ भी जानने की जरूरत है ।
सुब्रमण्यम स्वामी के व्याख्यान सोनिया के संदर्भ मे : 


 

सोनिया का भारत में पदार्पण:
सोनिया गांधी ने इतनी इंग्लिश सीख ली थी कि वो कैम्ब्रिज टाउन के यूनिवर्सिटी रेस्टोरेंट में वैट्रेस बन गईं। वो राजीव गांधी से पहली बार तब मिलीं जब वो 1965 में रेस्टोरेंट में आये। राजीव यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे , लेकिन वो लंबे समय तक अपने पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बिठा पाये इसलिए उन्हें 1966 में लंदन भेज दिया गया , जहां उनका दाखिला इंपीरियल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में हुआ। सोनिया भी लंदन चली आईं। मेरी सूचना के अनुसार उन्हें लाहौर के एक व्यवसायी सलमान तासिर के आउटफिट में नौकरी मिल गई। तासीर की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी का मुख्यालय दुबई में था लेकिन वो अपना ज्यादा समय लंदन में बिताते थे। आईएसआई से जुडे होने के लिए उनकी ये प्रोफाइल जरूरी थी। स्वाभावित तौर पर सोनिया इस नौकरी से इतना पैसा कमा लेती थीं कि राजीव को लोन फंड कर सकें। राजीव मां इंदिरा गांधी द्वारा भारत से भेजे गये पैसों से कहीं ज्यादा पैसे खर्च देते थे। इंदिरा ने राजीव की इस आदत पर मेरे सामने भी 1965 में तब मेरे सामने भी गुस्सा जाहिर किया था जब मैं हार्वर्ड में इकोनामिक्स का प्रोफेसर था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने मुझे ब्रेंनेडिस यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में , जहां वो ठहरी थीं , व्यक्तिगत तौर पर चाय के लिए आमंत्रित किया। पीएन लेखी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किये गये राजीव के छोटे भाई संजय को लिखे गये पत्र में साफ तौर पर संकेत दिया गया है कि वह वित्तीय तौर पर सोनिया के काफी कर्जदार हो चुके थे और उन्होंने संजय से अनुरोध किया था , जो उन दिनों खुद ब्रिटेन में थे और खासा पैसा उड़ा रहे थे और कर्ज में डूबे हुए थे। उन दिनों सोनिया के मित्रों में केवल राजीव गांधी ही नहीं थे बल्कि माधवराव सिंधिया भी थे। सिंधिया और एक स्टीगलर नाम का जर्मन युवक भी सोनिया के अच्छे मित्रों में थे। माधवराव की सोनिया से दोस्ती राजीव की सोनिया से शादी के बाद भी जारी रही। 1972 में माधवराव आईआईटी दिल्ली के मुख्य गेट के पास एक एक्सीडेंट के शिकार हुए और उसमें उन्हें बुरी तरह चोटें आईं , ये रात दो बजे की बात है , उसी समय आईआईटी का एक छात्र बाहर था। उसने उन्हें कार से निकाल कर ऑटोरिक्शा में बिठाया और साथ में घायल सोनिया को श्रीमती इंदिरा गांधी के आवास पर भेजा जबकि माधवराव सिंधिया का पैर टूट चुका था और उन्हें इलाज की दरकार थी। दिल्ली पुलिस ने उन्हें हॉस्पिटल तक पहुंचाया। दिल्ली पुलिस वहां तब पहुंची जब सोनिया वहां से जा चुकी थीं। बाद के सालों में माधवराव सिंधिया व्यक्तिगत तौर पर सोनिया के बड़े आलोचक बन गये थे और उन्होंने अपने कुछ नजदीकी मित्रों से अपनी आशंकाओं के बारे में भी बताया था। कितना दुर्भाग्य है कि वो 2001 में एक विमान हादसे में मारे गये। मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी उसी विमान से जाने वाले थे लेकिन उन्हें आखिरी क्षणों में फ्लाइट से न जाने को कहा गया। वो हालात भी विवादों से भरे हैं जब राजीव ने ओरबासानो के चर्च में सोनिया से शादी की थी , लेकिन ये प्राइवेट मसला है , इसका जिक्र करना ठीक नहीं होगा। इंदिरा गांधी शुरू में इस विवाह के सख्त खिलाफ थीं , उसके कुछ कारण भी थे जो उन्हें बताये जा चुके थे। वो इस शादी को हिन्दू रीतिरिवाजों से दिल्ली में पंजीकृत कराने की सहमति तब दी जब सोवियत समर्थक टी एन कौल ने इसके लिए उन्हें कंविंस किया , उन्होंने इंदिरा जी से कहा था कि ये शादी भारत-सोवियत दोस्ती के वृहद इंटरेस्ट में बेहतर कदम साबित हो सकती है। कौल ने भी तभी ऐसा किया जब सोवियत संघ ने उनसे ऐसा करने को कहा।
सोनिया के केजीबी कनेक्शन:
बताया जाता है कि सोनिया के पिता के सोवियत समर्थक होने के बाद से सोवियत संघ का संरक्षण सोनिया और उनके परिवार को मिलता रहा। जब एक प्रधानमंत्री का पुत्र लंदन में एक लड़की के साथ डेटिंग कर रहा था , केजीबी जो भारत और सोवियत रिश्तों की खासा परवाह करती थी , ने अपनी नजर इस पर लगा दी , ये स्वाभाविक भी था , तब उन्हें पता लगा कि ये तो स्टेफनो की बेटी है , जो उनका इटली का पुराना विश्वस्त सूत्र है। इस तरह केजीबी ने इस शादी को हरी झंडी दे दी। इससे पता चलता है कि केजीबी श्रीमती इंदिरा गांधी के घर में कितने अंदर तक घुसा हुआ था। राजीव और सोनिया के रिश्ते सोवियत संघ के हित में भी थे , इसलिए उन्होंने इस पर काम भी किया। राजीव की शादी के बाद मैनो परिवार को सोवियत रिश्तों से खासा फायदा भी हुआ। भारत के साथ सभी तरह सोवियत सौदों , जिसमें रक्षा सौदे भी शामिल थे , से उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम मिलती रही। एक प्रतिष्ठित स्विस मैगजीन स्विट्जर इलेस्ट्रेटेड के अनुसार राजीव गांधी के स्विस बैंक अकाउंट में दो बिलियन पाउंड जमा थे , जो बाद में सोनिया के नाम हो गये। डॉ. येवगेनी अलबैट (पीएचडी , हार्वर्ड) जाने माने रूसी स्कॉलर और जर्नलिस्ट हैं और वो अगस्त 1981 में राष्ट्रपति येल्तिसिन द्वारा बनाये गये केजीबी कमीशन के सद्स्यों में भी थीं। उन्होंने तमाम केजीबी की गोपनीय फाइलें देखीं , जिसमें सौदों से संबंधित फाइलें भी थीं। उन्होंने अपनी किताब द स्टेट विदइन स्टेट केजीबी इन द सोवियत यूनियन में उन्होंने इस तरह की गोपनीय बातों के रिफरेंस नंबर तक दे दिये हैं , जिसे किसी भी भारतीय सरकार द्वारा क्रेमलिन से औपचारिक अनुरोध पर देखा जा सकता है। रूसी सरकार की 1982 में अल्बैटस से मीडिया के सामने ये सब जाहिर करने पर भिङत भी हुई। उनकी बातों की सत्यता की पुष्टि रूस के आधिकारिक प्रवक्ता ने भी की। (ये हिन्दू 1982 में प्रकाशित हुई थी)। प्रवक्ता ने इन वित्तीय भुगतानों की पैरवी करते हुए कहा था कि सोवियत हितों की दृष्टि से ये जरूरी थे। इन भुगतानों में कुछ हिस्सा मैनो परिवार के पास गया , जिससे उन्होंने कांग्रेस पार्टी की चुनावों में भी फंडिंग की। 1981 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो चीजें श्रीमती सोनिया गांधी के लिए बदल गईं। उनका संरक्षक देश 16 देशों में बंट गया। अब रूस वित्तीय रूप से खोखला हो चुका था और अव्यवस्थाएं अलग थीं। इसलिए श्रीमती सोनिया गांधी ने अपनी निष्ठाएं बदल लीं और किसी और कम्युनिस्ट देश के करीब हो गईं , जो रूस का विरोधी है। रूस के मौजूदा प्रधानमंत्री और इससे पहले वहां के राष्ट्रपति रहे पुतिन एक जमाने में केजीबी के बड़े अधिकारी थे। जब डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो रूस ने अपने करियर डिप्लोमेट राजदूत को नई दिल्ली से वापस बुला लिया और तुरंत उसके पद पर नये राजदूत को तैनात किया , जो नई दिल्ली में 1960 के दशक में केजीबी का स्टेशन चीफ हुआ करता था। इस मामले में डॉ. अल्बैट्स का रहस्योदघाटन समझ में आता है कि नया राजदूत सोनिया के केजीबी के संपर्कों के बारे में बेहतर तरीके से जानता था। वो सोनिया से स्थानीय संपर्क का काम कर सकता था। नई सरकार सोनिया के इशारों पर ही चलती है और उनके जरिए आने वाली रूसी मांगों को अनदेखा भी नहीं कर सकती। क्या इससे ये नहीं लगता कि ये भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक भी हो सकता है। वर्ष 2001 में मैंने दिल्ली में एक रिट याचिका दायर की , जिसमें केजीबी डाक्यूमेंट्स की फोटोकापियां भी थीं और इसमें मैंने सीबीआई जांच की मांग की थी लेकिन वाजपेई सरकार ने इसे खारिज कर दिया। इससे पहले सीबीआई महकमे को देखने वाली गृह राज्य मंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने मेरे 3 मार्च 2001 के पत्र पर सीबीआई जांच का आदेश भी दे दिया था लेकिन इस मामले पर सोनिया और उनकी पार्टी ने संसद की कार्रवाई रोक दी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेई ने वसुधरा की जांच के आदेश को खारिज कर दिया। मई 2002 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक दिशा निर्देश जारी किया कि वो रूस से मालूम करे कि सत्यता क्या है , रुसियों ने ऐसी किसी पूछताछ का कोई जवाब नहीं दिया लेकिन सवाल ये है कि किसने सीबीआई को इस मामले पर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया था। वाजपेई सरकार ने , लेकिन क्यों ? इसकी भी एक कहानी है। अब सोनिया ड्राइविंग सीट पर हैं और सीबीआई की स्वायत्ता लगभग खत्म सी हो चुकी है
सोनिया और भारत के कानूनों का हनन :
सोनिया के राजीव से शादी के बाद वह और उनकी इतालवी परिवार को उनके दोस्त और स्नैम प्रोगैती के नई दिल्ली स्थित प्रतिनिधि आटोवियो क्वात्रोची से मदद मिली। देखते ही देखते मैनो परिवार इटली में गरीबी से उठकर बिलियोनायर हो गया। ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसे छोड़ा गया। 19 नवंबर 1964 को नये सांसद के तौर पर मैंने प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी से संसद में पूछा क्या उनकी बहू पब्लिक सेक्टर की इंश्योरेंस के लिए इंश्योरेंस एजेंट का काम करती है (ओरिएंट फायर एंड इंश्योरेंस) और वो भी प्रधानमंत्री हाउस के पते पर और उसके जरिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके पीएमओ के अधिकारियों का इंश्योरेंस करती हैं। जबकि वो अभी इतालवी नागरिक ही हैं (ये फेरा के उल्लंघन का मामला भी था) । संसद में हंगामा हो गया। कुछ दिनों बाद एक लिखित जवाब में उन्होंने इसे स्वीकार किया और कहा हां ऐसा हुआ था और ऐसा गलती से हुआ था लेकिन अब सोनिया गांधी ने इंश्योरेंस कंपनी से इस्तीफा दे दिया है। जनवरी 1970 में श्रीमती इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में लौटीं और सोनिया ने पहला काम किया और ये था खुद को वोटर लिस्ट में शामिल कराने का। ये नियमों और कानूनों का सरासर उल्लंघन था। इस आधार पर उनका वीसा भी रद्द किया जा सकता था तब तक वो इतालवी नागरिक के रूप में कागजों में दर्ज थीं। जब मीडिया ने इस पर हल्ला मचाया तो मुख्य निर्वाचक अधिकारी ने उनका नाम 1972 में डिलीट कर दिया। लेकिन जनवरी 1973 में उन्होंने फिर से खुद को एक वोटर के रूप में दर्ज कराया जबकि वो अभी भी विदेशी ही थीं और उन्होंने पहली बार भारतीय नागरिकता के लिए अप्रैल 1973 में आवेदन किया था।
सोनिया गांधी आधुनिक रॉबर्ट क्लाइव :
मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी भारतीय कानूनों का सम्मान नहीं करतीं। अगर कभी उन्हें किसी मामले में गलत पाया गया या कठघरे में खडा किया गया तो वो हमेशा इटली भाग सकती हैं। पेरू में राष्ट्रपति फूजीमोरी जो खुद को पेरू में पैदा हुआ बताते थे , जब भ्रष्टाचार के मामले में फंसे और उन पर अभियोग चलने लगा तो वो जापान भाग गये और जापानी नागरिकता के लिए दावा पेश कर दिया। 1977 में जब जनता पार्टी ने चुनावों में कांग्रेस को हराया और नई सरकार बनाई तो सोनिया अपने दोनों बच्चों के साथ नई दिल्ली के इतालवी दूतावास में भाग गईं और वहीं छिपी रहीं यहां तक की इस मौके पर उन्होंने इंदिरा गांधी को भी उस समय छोड़ दिया। ये बात अब कोई नई नहीं है बल्कि कई बार प्रकाशित भी हो चुकी है। राजीव गांधी उन दिनों सरकारी कर्मचारी (इंडियन एयरलाइंस में पायलट) थे। लेकिन वो भी सोनिया के साथ इस विदेशी दूतावास में छिपने के लिए चले गये। ये था सोनिया का उन पर प्रभाव। राजीव 197८ में सोनिया के प्रभाव से बाहर निकल चुके थे लेकिन जब तक वो स्थितियों को समझ पाते तब तक उनकी हत्या हो चुकी थी। जो लोग राजीव के करीबी हैं , वो जानते हैं कि वो 1981 के चुनावों के बाद सोनिया को लेकर कोई सही कदम उठाने वाले थे। उन्होंने सभी प्रकार के वित्तीय घोटालों और 197८ के चुनावों में हार के लिए सोनिया को जिम्मेदार माना था। मैं तो ये भी मानता हूं कि सोनिया के करीबी लोग राजीव से घृणा करते थे। इस बात का जवाब है कि राजीव के हत्यारों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के मृत्युदंड के फैसले पर मर्सी पीटिशन की अपील राष्ट्रपति से की गई। ऐसा उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह के लिए क्यों नहीं किया या धनंजय चट्टोपाध्याय के लिए नहीं किया ? वो लोग जो भारत से प्यार नहीं करते वो ही भारत के खजाने को बाहर ले जाने का काम करते हैं , जैसा मुहम्मद गौरी , नादिर शाह और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने किया था। ये कोई सीक्रेट नहीं रह गया है। लेकिन सोनिया गांधी तो उससे भी आगे निकलती हुई लग रही हैं। वो भारतीय खजाने को जबरदस्त तरीके से लूटती हुई लग रही हैं। जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जब क्रेट के क्रेट बहुमूल्य सामानों को बिना कस्टम जांच के नई दिल्ली या चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से रोम न भेजा गया हो। सामान ले जाने के लिए एयर इंडिया और अलीटालिया को चुना जाता था। इसमें एंटिक के सामान , बहुमूल्य मूर्तियां , शॉल्स , आभूषण , पेंटिंग्स , सिक्के और भी न जाने कितनी ही बहुमूल्य सामान होते थे। ये सामान इटली में सोनिया की बहन अनुष्का उर्फ अलेक्सांद्रो मैनो विंसी की रिवोल्टा की दुकान एटनिका और ओरबासानो की दुकान गणपति पर डिसप्ले किया जाता था। लेकिन यहां उनकी बिक्री ज्यादा नहीं थी इसलिए इसे लंदन भेजा जाने लगा और सोठेबी और क्रिस्टी के जरिए बेचा जाने लगा। इस कमाई का एक हिस्सा राहुल गांधी के वेस्टमिनिंस्टर बैंक और हांगकांग एंड शंघाई बैंक की लंदन स्थित शाखाओं में भी जमा किया गया। लेकिन ज्यादातर पैसा गांधी परिवार के लिए काइमन आइलैंड के बैंक आफ अमेरिका में है। राहुल जब हार्वर्ड में थे तो उनकी एक साल की फीस बैंक आफ अमेरिका काइमन आइलैंड से ही दी जाती थी। मैं वाजपेई सरकार को इस बारे में बार-बार बताता रहा लेकिन उन्हें विश्वास में नहीं ले सका , तब मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दायर की। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को इंटरपोल और इटली सरकार की मदद लेकर जांच करने को कहा। इंटरपोल ने इन दोनों दुकानों की एक पूरी रिपोर्ट तैयार करके सीबीआई को भी दी , जिसे कोर्ट ने सीबीआई से मुझे दिखाने को भी कहा , लेकिन सीबीआई ने ऐसा कभी नहीं किया। सीबीआई का झूठ तब भी अदालत में सबके सामने आ चुका था जब उसने अलेक्सांद्रो मैनो का नाम एक आदमी का बताया और विया बेलिनी 14 , ओरबासानो को एक गांव का नाम बताया था जबकि मैनो के निवास की स्ट्रीट का पता था। अलबत्ता सीबीआई के वकील द्वारा इस गलती के लिए अदालत के सामने खेद जाहिर करना था लेकिन उसे नई सरकार द्वारा एडिशिनल सॉलिसीटर जनरल के पद पर प्रोमोट कर दिया गया।
स्वामी ने सोनिया को लपेटा :
जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने अब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जद में कांग्रेस व यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी ले आए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पौने दो लाख करोड के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में 60 हजार करोड रुपए घूस बांटी गई जिसमें चार लोग हिस्सेदार थे। इस घूस में सोनिया गांधी की दो बहनों का हिस्सा 30-30 प्रतिशत है। 10 जनपथ को घोटाले का केंद्र बिंदु बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री सब कुछ जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहे। स्पेक्ट्रम मामले पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई से पहले अपने घर आराम करने देहरादून पहुंचे स्वामी ने पत्रकार वार्ता के दौरान २जी मामले में कांग्रेस नेतृत्व पर कई आरोप लगा स्वामी ने दावा किया इस घोटाले में घूस के तौर पर बांटे गए 60 हजार करोड़ रुपये का दस प्रतिशत हिस्सा पूर्व संचार मंत्री ए राजा को गया। 30 फीसदी हिस्सेदारी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि को और 30-30 प्रतिशत हिस्सेदारी सोनिया गांधी की दो बहनों नाडिया और अनुष्का को गया है। हालांकि इसके कोई दस्तावेजी सबूत उन्होंने उपलब्ध नहीं कराए। स्वामी ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि अमेरिका से स्पेक्ट्रम मामले में हुए लेनदेन का रिकार्ड भी मंगाया जाए। साथ ही उन्होंने पूर्व मंत्री ए राजा की सुरक्षा की मांग भी प्रधानमंत्री से की है। उनका कहना था कि ए राजा की सबसे अच्छी सुरक्षा तभी हो सकती है जब वो जेल में हों या फिर उन्हें हाउस अरेस्ट किया जाए। स्वामी ने राजा की सुरक्षा को लेकर लिखी चिठ्ठी के जवाब में प्रधानमंत्री की ओर से आए पत्र को भी सार्वजनिक किया। इस पत्र में कहा गया है कि ए राजा को उचच स्तरीय सुरक्षा दी जा रही है और स्पेक्ट्रम डील के बैंक रिकॉर्ड की जानकारी के लिए अमेरिका सरकार से कहा जा रहा है। ए राजा की चिंता की वजह पूछे जाने पर स्वामी ने कहा कि इस महाघोटाले की सारी जानकारी राजा के पास है। इस मामले में अरब देशों के अंडरवर्ल्ड के लोग भी शामिल हैं। राजा की हत्या कर वे सबूत मिटाना चाहेंगे। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव मुहिम में सहयोग करने पर भी खुद को तैयार बताया ....